उत्तर प्रदेश की राजनीति में अयोध्या का जिक्र आते ही सियासी पारा चढ़ना स्वाभाविक है। आगामी चुनावों की आहट के बीच समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव का अयोध्या दौरा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। सवाल ये नहीं कि वे वहां क्यों गए, बल्कि सबसे बड़ा सवाल ये है कि उन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर में दर्शन क्यों नहीं किए?
क्या है पूरा मामला?
अखिलेश यादव का अयोध्या पहुंचना कोई नई बात नहीं है, लेकिन उनके कार्यक्रम की रूपरेखा हमेशा से चर्चा का विषय रही है। इससे पहले 2022 के विधानसभा चुनाव के दौरान भी जब वे अयोध्या पहुंचे थे, तो उन्होंने नया घाट तक रोड शो किया था, लेकिन रामलला के दरबार में हाजिरी नहीं लगाई थी।
इस बार भी उसी परंपरा का पालन होता देख स्थानीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है। समर्थकों का तर्क है कि वे निजी दौरे पर थे, लेकिन विपक्षी दल और अयोध्या के संत समाज इसे राजनीतिक चश्मे से देख रहे हैं।
संत समाज का कड़ा रुख
अयोध्या के कई प्रमुख संतों ने अखिलेश यादव की इस चुप्पी पर सवाल उठाए हैं। संतों का कहना है कि यदि एक नेता अयोध्या की पावन भूमि पर कदम रखता है और करोड़ों हिंदुओं की आस्था के केंद्र राम मंदिर में नहीं जाता, तो यह जनता के प्रति उदासीनता का संकेत है।
- मंदिर से दूरी पर संतों ने इसे ‘तुष्टीकरण की राजनीति’ का हिस्सा बताया है।
- राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, अखिलेश की यह रणनीति एक खास वोट बैंक को साधने की कोशिश हो सकती है।
- भाजपा इसे बड़ा मुद्दा बनाकर चुनावी मैदान में सपा को घेरने की तैयारी में है।
मायने और प्रभाव
अखिलेश यादव का यह कदम ‘धर्मनिरपेक्ष’ छवि बनाए रखने और अपने आधारभूत वोट बैंक को एकजुट रखने की कोशिश माना जा रहा है। हालांकि, उत्तर प्रदेश के बदलते राजनीतिक मिजाज में, राम मंदिर से दूरी बना लेना किसी भी बड़े नेता के लिए जोखिम भरा साबित हो सकता है।
आम जनता के लिए यह स्पष्ट है कि अयोध्या अब केवल एक शहर नहीं, बल्कि एक ऐसा लिटमस टेस्ट है जहां से गुजरते वक्त हर नेता की आस्था और रणनीति को जनता बारीकी से देखती है। आने वाले चुनाव में यह ‘दर्शन या दूरी’ का मुद्दा सपा के लिए कितना फायदेमंद या नुकसानदेह होगा, यह तो भविष्य ही बताएगा।


