अयोध्या में रामलला के दर्शन के लिए समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव का दौरा एक बार फिर उत्तर प्रदेश की सियासत को गरमा गया है। जैसे ही उनके कार्यक्रम की चर्चा तेज हुई, सत्ताधारी दल ने मोर्चा खोल दिया। उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने सपा प्रमुख पर कड़ा प्रहार करते हुए इसे महज एक ‘व्यक्तिगत एजेंडा’ करार दिया है।
‘नाटक मंडली के सरगना हैं अखिलेश’
उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने मीडिया से बातचीत में तल्ख लहजे में कहा कि अखिलेश यादव ‘नाटक मंडली’ के पुराने सरगना हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सपा प्रमुख का अयोध्या आना आस्था से प्रेरित नहीं, बल्कि दिखावा है। पाठक ने दावा किया कि उत्तर प्रदेश की जनता अब इन सियासी पैंतरों को अच्छी तरह समझ चुकी है और उनके बहकावे में आने वाली नहीं है।
कारसेवकों का मुद्दा और तीखे बोल
ब्रजेश पाठक ने अपने बयान में पुरानी घटनाओं का जिक्र करते हुए सपा पर सीधा निशाना साधा। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी के हाथ कारसेवकों के खून से रंगे हैं। उप मुख्यमंत्री ने सवाल उठाया कि जो लोग पहले धर्मस्थल के प्रति विपरीत रुख रखते थे, आज वे किस मुंह से वहां दर्शन करने की बात कर रहे हैं।
मायने और प्रभाव: अयोध्या की सियासत का गणित
अयोध्या का मुद्दा भारतीय राजनीति के केंद्र में रहा है। अखिलेश यादव के इस दौरे के राजनीतिक मायने बेहद गहरे हैं:
- वोट बैंक की घेराबंदी: सपा इस दौरे के जरिए ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के साथ-साथ हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी पैठ बनाने की कोशिश में है।
- सत्ता पक्ष की चुनौती: बीजेपी इस दौरे को ‘राजनीतिक पर्यटन’ बताकर सपा की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रही है।
- जनता पर असर: अयोध्या जैसे संवेदनशील मुद्दे पर दोनों प्रमुख दलों की बयानबाजी सीधे तौर पर राज्य के राजनीतिक माहौल को और अधिक ध्रुवीकृत करने का काम कर रही है।
यह तल्खी दिखाती है कि आने वाले दिनों में अयोध्या को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति और अधिक आक्रामक होने वाली है। क्या जनता इस बार चुनावी नफा-नुकसान से परे जाकर इस दौरे को देखती है, या यह सिर्फ एक और सियासी बयानबाजी बनकर रह जाएगा, यह देखना दिलचस्प होगा।





