कानपुर समेत पूरे उत्तर भारत में शनिवार को माताओं का सबसे कठिन और पवित्र व्रत ‘जितिया’ (जीवित्पुत्रिका) पूरी श्रद्धा के साथ मनाया गया। अपनी संतान की लंबी उम्र, बेहतर स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना के लिए माताओं ने बिना अन्न-जल ग्रहण किए कठोर तप किया। सीटीआई शनि मंदिर जैसे प्रमुख धार्मिक स्थलों पर महिलाओं की भारी भीड़ देखी गई, जहाँ उन्होंने विधि-विधान से भगवान जीमूतवाहन की पूजा-अर्चना की।
तीन दिनों का महापर्व और नियम
जितिया का पर्व तीन दिनों तक चलता है, जो माताओं के अदम्य संकल्प को दर्शाता है। पहले दिन ‘नहाय-खाय’ के साथ शुद्ध सात्विक भोजन ग्रहण करने के बाद, दूसरे दिन मुख्य निर्जला उपवास शुरू होता है। इस दिन माताएं पूरे 24 घंटे से अधिक समय तक पानी की एक बूंद भी ग्रहण नहीं करतीं।
पूजा की पारंपरिक विधि
जितिया पूजा का स्वरूप पूरी तरह से लोक-परंपराओं पर आधारित है। पूजा के दौरान मिट्टी और गोबर से चील और सियारिन की आकृति बनाई जाती है, जो इस पर्व की पौराणिक कथाओं से जुड़ी है। पूजा में तोरई के पत्ते, लाल-पीले धागे और आटे-गुड़ से बने ठेकुए का विशेष महत्व होता है। व्रत का समापन तीसरे दिन सूर्योदय के बाद ‘पारण’ से होता है, जिसमें मरुवा की रोटी और नोनी का साग खाने की सदियों पुरानी परंपरा है।
मायने और प्रभाव: यह व्रत क्यों है खास?
जितिया व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह परिवार की मजबूती का प्रतीक है। आधुनिक दौर की भागदौड़ भरी जिंदगी में, यह व्रत माताओं की उस त्याग और ममता को दर्शाता है जो वे अपनी संतानों के लिए रखती हैं। सामाजिक दृष्टि से देखें तो यह त्योहार पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक जुड़ाव को बनाए रखने का भी माध्यम है। जब महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में समूह में पूजा करती हैं, तो इससे सामुदायिक सद्भाव बढ़ता है और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा मिलती है।


