24 सितंबर 2002 का वह काला दिन, जब गुजरात के गांधीनगर स्थित अक्षरधाम मंदिर गोलियों की तड़तड़ाहट और मासूमों की चीखों से दहल उठा था। दो आतंकियों ने मंदिर परिसर में जो तांडव मचाया, उसमें 33 बेगुनाह लोगों ने अपनी जान गंवा दी। आज इस घटना को 24 साल बीत चुके हैं, लेकिन सवाल अब भी वही है—आखिर इस बर्बर साजिश के असली गुनहगार कौन थे?
क्या नाकाम रही जांच एजेंसियां?
हमले के फौरन बाद जांच एजेंसियों ने बड़ी कार्रवाई करते हुए 34 संदिग्धों को गिरफ्तार किया था। इस मामले ने देश की अदालतों में करीब 12 साल तक लंबी कानूनी लड़ाई देखी। पुलिस और सरकारी वकीलों ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया, लेकिन 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला सुनाया, उसने हर किसी को चौंका दिया।
सर्वोच्च न्यायालय ने सबूतों के अभाव में सभी आरोपियों को बरी कर दिया। कोर्ट की सख्त टिप्पणी ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए। जिन लोगों को मास्टरमाइंड बताया गया था, वे रिहा कर दिए गए और फाइलें आज भी धूल फांक रही हैं।
मायने और प्रभाव: न्याय का अधूरा सफर
अक्षरधाम कांड का सच सामने न आना केवल कानूनी हार नहीं, बल्कि उन 33 परिवारों के लिए एक कभी न भरने वाला जख्म है जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया था। इसके प्रभाव को इन बिंदुओं से समझा जा सकता है:
- एजेंसियों की साख पर सवाल: सालों तक चले मुकदमे के बाद सभी का बरी होना सुरक्षा एजेंसियों की तकनीकी जांच और सबूत जुटाने की प्रक्रिया पर बड़े प्रश्नचिह्न लगाता है।
- आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई: जब मुख्य साजिशकर्ता कानून की पकड़ से दूर रह जाते हैं, तो यह समाज में असुरक्षा का भाव पैदा करता है और आतंक विरोधी अभियानों की विश्वसनीयता को कम करता है।
- पीड़ितों का दर्द: ढाई दशक बाद भी यह स्पष्ट न होना कि हमला किसने कराया था, एक लोकतांत्रिक देश के न्यायिक इतिहास के लिए दुखद पहलू है।
आज 24 साल बाद भी, अक्षरधाम की वो दीवारें उस खामोश सच का इंतजार कर रही हैं, जिसे देश की तमाम एजेंसियां मिलकर भी नहीं खोज पाईं। क्या हम कभी जान पाएंगे कि उस दिन का असली गुनहगार कौन था?


