उत्तराखंड की तराई से लेकर लखीमपुर खीरी तक फैली उपजाऊ जमीन पर आज एक अजीब सा सन्नाटा पसरा है। कभी घने जंगलों और जंगली जानवरों के आतंक के बीच अपनी मेहनत से सोना उगाने वाले किसान आज अपनी ही जमीन पर बेगाने होने के डर में जी रहे हैं। आजादी के बाद से तराई की इस धरती को ‘मिनी पंजाब’ बनाने वाले परिवारों को अब अपना घर और खेत छिनने का डर सता रहा है।
जंगल से खेत तक का संघर्ष
आजादी के वक्त जब विभाजन की विभीषिका के बाद लोग उजड़कर आए थे, तब तराई का यह इलाका मलेरिया और खूंखार जानवरों का गढ़ था। इन साहसी किसानों ने सरकार के आह्वान पर बंजर जमीन को अपने खून-पसीने से सींचा। आज यह इलाका गन्ना, धान, गेहूं और पिपरमेंट का देश में सबसे बड़ा उत्पादक केंद्र है। 7680 किमी में फैला यह बेल्ट न केवल उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था का आधार है, बल्कि इन किसानों की जीविका का एकमात्र जरिया भी है।
क्यों उठ रहे हैं बेदखली के सवाल?
पिछले कुछ समय से प्रशासन की ओर से भूमि के मालिकाना हक को लेकर उठ रहे सवालों ने किसानों की रातों की नींद उड़ा दी है। पीढ़ियों से काबिज किसान अब कागजों की उलझन में फंसे हैं। स्थानीय किसानों का आरोप है कि सरकारी नीतियों और कानूनी पेचीदगियों के कारण उनकी वर्षों पुरानी मेहनत पर पानी फेरा जा रहा है।
- दशकों से खेती कर रहे किसानों के पास मालिकाना हक के पक्के दस्तावेज का अभाव।
- सरकारी जमीनों के सीमांकन और नए नियमों के चलते बढ़ता प्रशासनिक दबाव।
- किसान संगठनों का आरोप- ये उनके अस्तित्व और पहचान पर हमला है।
मायने और प्रभाव: आम जनता पर असर
तराई क्षेत्र में किसानों की यह अनिश्चितता केवल एक समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे उत्तर प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा संकट बन सकती है। यदि इन किसानों को हटाया जाता है, तो न केवल खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित होगा, बल्कि सामाजिक अस्थिरता भी बढ़ सकती है। यह मामला केवल ‘जमीन’ का नहीं, बल्कि उस ‘भरोसे’ का भी है जो आजादी के बाद सरकारों ने उन विस्थापितों को दिया था। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राज्य की राजनीति में बड़े बदलाव का कारण बन सकता है, क्योंकि इन परिवारों का वजूद खतरे में है।





