पहाड़ों की ठंडी हवाएं और बर्फीली चोटियों का रोमांच हर किसी को लुभाता है, लेकिन 18 साल की उम्र में उन रास्तों पर चलना, जहां कदम-कदम पर मौत का खतरा हो, हर किसी के बस की बात नहीं। शिवानी मेहरोत्रा ने इसी जुनून के साथ न केवल यूरोप की सबसे ऊंची चोटी ‘माउंट एलब्रुस’ को फतह किया है, बल्कि उन तमाम रूढ़ियों को भी तोड़ दिया है जो कहती हैं कि लड़कियां घर की दहलीज पार नहीं कर सकतीं।
शुरुआत: कश्मीर की वादियों से रूस के शिखरों तक
शिवानी का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। घर की जिम्मेदारियों के बीच दबे होने के बावजूद उन्होंने अपने सपनों को कभी मरने नहीं दिया। कश्मीर और लद्दाख की दुर्गम पहाड़ियों में शुरुआती अनुभव हासिल करने के बाद, उन्होंने फ्रेंडशिप पीक को अपना लक्ष्य बनाया।
अफ्रीका की सबसे ऊंची चोटी ‘किलिमंजारो’ को सफलतापूर्वक फतह करने के बाद, शिवानी ने रूस के माउंट एलब्रुस की ओर रुख किया। यह चढ़ाई आसान नहीं थी, लेकिन उनकी जिद्द और तैयारी ने इसे मुमकिन कर दिखाया।
चुनौतियां और परिवार का साथ
महज 18 साल की उम्र में घर की आर्थिक और सामाजिक जिम्मेदारियों का बोझ संभालना, और साथ ही माउंट एवरेस्ट जैसा जज्बा रखना, यह दिखाता है कि शिवानी के इरादे कितने फौलादी हैं। उन्होंने न केवल खुद को साबित किया, बल्कि तमाम युवाओं के लिए एक नजीर पेश की है कि अगर हौसले बुलंद हों, तो दुनिया की कोई भी चोटी पहुंच से बाहर नहीं है।
मायने और प्रभाव: यह कहानी क्यों महत्वपूर्ण है?
शिवानी की यह उपलब्धि सिर्फ एक मेडल या तिरंगा फहराने तक सीमित नहीं है। इसके मायने गहरे हैं:
- युवाओं के लिए प्रेरणा: यह दर्शाता है कि उम्र या संसाधन नहीं, बल्कि दृढ़ इच्छाशक्ति ही कामयाबी की कुंजी है।
- घरेलू जिम्मेदारियों बनाम करियर: भारत जैसे समाज में जहां लड़कियां घरेलू जिम्मेदारियों में उलझकर अपने सपने छोड़ देती हैं, शिवानी का उदाहरण उन्हें राह दिखाएगा।
- पर्वतारोहण में भविष्य: उनकी सफलता भारत में एडवेंचर स्पोर्ट्स के प्रति युवाओं के नजरिए को बदलेगी और उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन करने के लिए प्रोत्साहित करेगी।
शिवानी की अगली मंजिल क्या होगी, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन उन्होंने साबित कर दिया है कि आसमान को छूने की चाहत रखने वालों के लिए कोई सीमा नहीं होती।





