गहरा शोक और सरकारी बेरुखी की दास्तां
कानपुर के पुरवामीर गांव में मातम पसरा है। 18 साल की यशी की मौत के दो दिन बाद भी उसके घर की दीवारों पर गम का सन्नाटा है। जिस बेटी को कभी हंसी-खुशी विदा करने के सपने देखे थे, उसे एक बेपरवाह गड्ढे ने निगल लिया। 22 फीट गहरा वो गड्ढा आज भी उस परिवार को डरा रहा है, लेकिन प्रशासन की नींद अभी भी नहीं खुली है।
अधूरे सपने और खुद फावड़ा उठाने की मजबूरी
यशी के पिता विनोद और भाई भास्कर की आंखों में आंसू सूख चुके हैं, लेकिन उनके हाथों में फावड़ा है। सरकारी मदद के इंतज़ार में हाथ पर हाथ धरे बैठने के बजाय, इस टूटे हुए पिता-पुत्र की जोड़ी ने खुद ही उस गड्ढे को भरने की ठान ली है। पड़ोसी के बरामदे में रात गुज़ारने को मजबूर ये लोग अपनी बची-खुची ज़िंदगी को किसी तरह सुरक्षित करने की जद्दोजहद कर रहे हैं।
प्रशासन की खामोशी पर सवाल
सवाल ये उठता है कि आखिर किसकी लापरवाही से 18 साल की एक होनहार बेटी की जान गई? गांव वालों का कहना है कि प्रशासन ने अब तक इस हादसे की सुध नहीं ली है। न तो गड्ढे की घेराबंदी की गई और न ही परिवार को ढांढस बंधाने कोई बड़ा अधिकारी पहुंचा।
- हादसे वाली जगह पर अभी भी सुरक्षा का कोई इंतज़ाम नहीं।
- परिवार आर्थिक और मानसिक रूप से पूरी तरह टूट चुका है।
- स्थानीय लोगों में प्रशासन की इस बेरुखी को लेकर भारी आक्रोश है।
मायने और प्रभाव: क्या बदलती है व्यवस्था?
यह घटना सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि सिस्टम की उस लापरवाही का आईना है जो अक्सर गरीब की सुनवाई नहीं करती। जब एक पिता को अपनी बेटी को खोने के गम के बीच खुद गड्ढा भरना पड़े, तो यह प्रशासन के दावों पर बड़ा तमाचा है। भविष्य में ऐसे हादसों को रोकने के लिए जवाबदेही तय करना ज़रूरी है, ताकि किसी और विनोद को अपने हाथों से ‘मौत के गड्ढे’ न भरने पड़ें।




