हाथरस हादसे की जांच अब एक बेहद अहम मोड़ पर पहुंच चुकी है। मौके पर तैनात रही कांस्टेबल शिल्पी ने अदालत में जो बयान दिया है, उसने आयोजन समिति और वहां मौजूद सेवादारों की बड़ी लापरवाही पर से पर्दा उठा दिया है। शिल्पी के मुताबिक, जब पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने की कोशिश की, तो सेवादारों ने साफ कह दिया था कि हमें पुलिस की कोई जरूरत नहीं है, सब कुछ हम संभाल लेंगे।
क्या हुआ था उस दिन?
कांस्टेबल शिल्पी ने कोर्ट को बताया कि दोपहर करीब दो बजे जैसे ही भोले बाबा का काफिला सत्संग स्थल से निकलने लगा, वहां मौजूद भक्तों में अफरातफरी मच गई। बाबा के पैर छूने और चरणरज लेने के लिए लोग जान जोखिम में डालकर आगे बढ़ने लगे। इस दौरान वहां मौजूद सेवादारों ने सुरक्षा घेरा बनाने के बजाय अपनी मनमानी की, जिससे स्थिति बेकाबू हो गई।
सेवादारों का ‘ओवर-कॉन्फिडेंस’ बना काल
गवाही में सामने आया है कि भारी भीड़ के बावजूद आयोजन समिति ने पुलिस को अपना काम ठीक से नहीं करने दिया। सेवादारों ने सुरक्षा के नाम पर पुलिस को मुख्य स्थल से दूर रखा। जब स्थिति बिगड़ती दिखी, तो भगदड़ मच चुकी थी और कई जिंदगियां काल के गाल में समा गईं। यह बयान सीधे तौर पर आयोजन समिति के उस दावे पर सवाल खड़े करता है जिसमें उन्होंने सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता होने की बात कही थी।
मायने और प्रभाव
इस गवाही का सीधा असर मामले की कानूनी दिशा पर पड़ेगा। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- जिम्मेदारी का निर्धारण: पुलिस को काम करने से रोकना अब सीधे तौर पर आपराधिक लापरवाही के दायरे में आता है।
- आयोजकों की जवाबदेही: यह बयान साबित करता है कि भीड़ प्रबंधन के दावों के पीछे केवल दिखावा था, जिससे आम जनता को अपनी जान गंवानी पड़ी।
- प्रशासनिक सबक: भविष्य में किसी भी बड़े धार्मिक आयोजन में प्रशासन को सेवादारों के भरोसे बैठने के बजाय पुलिस की भूमिका को प्राथमिकता देनी होगी।



