अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के भीतर की हलचल अब सार्वजनिक बहस का केंद्र बन गई है। चंपत राय के हालिया तीखे तेवरों ने ट्रस्ट के कामकाज और नृपेंद्र मिश्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। संतों के बीच दबी जुबान में उठ रही चर्चाएं अब एक बड़े विवाद का रूप ले रही हैं।
नृपेंद्र मिश्र पर लगे गंभीर आरोप
विवाद की शुरुआत 18 जून को नृपेंद्र मिश्र द्वारा दिए गए टीवी साक्षात्कारों से हुई। ट्रस्ट के भीतर यह चर्चा जोरों पर है कि उनके बयानों में लगातार बदलाव क्यों आ रहे हैं? चंपत राय ने सिलसिलेवार तरीके से उन बिंदुओं को उठाया है, जहां मंदिर की व्यवस्था और फैसलों में ट्रस्ट की मर्यादा को दरकिनार किया गया।
संतों की नाराजगी और ‘खलनायक’ वाली बात
अयोध्या के कई वरिष्ठ संतों ने सीधे तौर पर यह सवाल किया है कि क्या नृपेंद्र मिश्र पर्दे के पीछे से मंदिर के निर्णयों को प्रभावित कर रहे हैं? संतों का आरोप है कि ट्रस्ट की बैठकों में उनकी कार्यशैली और पारदर्शिता की कमी ने न केवल ट्रस्ट की गरिमा को नुकसान पहुंचाया है, बल्कि मंदिर निर्माण से जुड़े फंड के प्रबंधन पर भी सवाल खड़े किए हैं।
- ट्रस्ट की बैठकों में नृपेंद्र मिश्र की गैरमौजूदगी पर सवाल।
- फंड के प्रबंधन में पारदर्शिता को लेकर संतों की शंका।
- चंपत राय का मुखर विरोध और भविष्य की राह।
मायने और प्रभाव: आम जनता पर क्या असर?
यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ एक प्रशासनिक विवाद नहीं है, बल्कि करोड़ों राम भक्तों की आस्था से जुड़ा विषय है। जब ट्रस्ट के शीर्ष पदाधिकारी आपस में आमने-सामने हों, तो चंदे के पैसे के उपयोग और मंदिर की पवित्रता पर जनता का भरोसा डगमगाता है। इस कलह का सीधा प्रभाव मंदिर निर्माण की गति और भविष्य में मिलने वाले दान पर पड़ सकता है। यदि इन आरोपों का जल्द निराकरण नहीं हुआ, तो यह देशव्यापी विवाद का रूप ले सकता है, जो आने वाले समय में ट्रस्ट की साख के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होगा।

