कानपुर चिड़ियाघर की झील एक बार फिर मछलियों की कब्रगाह बन गई है। महज 18 दिन के भीतर दूसरी बार सैकड़ों मछलियों के मरने से हड़कंप मच गया है। झील की सतह पर उतराती मरी हुई मछलियां प्रशासन की लापरवाही की गवाही दे रही हैं, जबकि जिम्मेदार अधिकारी अभी भी ठोस कदम उठाने के बजाय केवल खानापूर्ति में लगे हुए हैं।
क्या है पूरा मामला?
सोमवार को जैसे ही झील में मछलियों के उतराने की खबर मिली, चिड़ियाघर प्रशासन सक्रिय हुआ और नावों के जरिए मरी हुई मछलियों को बाहर निकलवाकर उन्हें दफन किया गया। 24 जुलाई को भी ठीक इसी तरह की स्थिति पैदा हुई थी, तब करीब 200 से अधिक मछलियों की मौत हुई थी। उस समय प्रशासन ने दावा किया था कि ऑक्सीजन बढ़ाने वाली दवाओं का छिड़काव किया गया है, लेकिन हकीकत यह है कि झील आज भी जलकुंभी और घास से पूरी तरह पटी पड़ी है।
प्रशासन की सुस्ती और प्रदूषण का खतरा
चिड़ियाघर प्रशासन ने झील में ऑक्सीजन की कमी और जलकुंभी को मछलियों की मौत का कारण बताया है। हैरान करने वाली बात यह है कि सफाई का काम कुछ दिन चलाकर बीच में ही रोक दिया गया। इसके अलावा, झील में मिलने वाले प्रदूषित नाले की जांच के लिए नगर निगम को कई बार पत्र लिखे गए, लेकिन अब तक निगम की टीम न तो पहुंची और न ही पानी के नमूनों की कोई वैज्ञानिक जांच हो सकी है।
मायने और प्रभाव: आम जनता पर क्या असर?
यह मामला केवल मछलियों की मौत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कानपुर के पर्यावरण और प्रशासन की कार्यशैली पर गहरे सवाल खड़े करता है:
- पर्यावरण की अनदेखी: झील में लगातार हो रही मछलियों की मौत शहर के जल निकायों के प्रदूषित होने का स्पष्ट संकेत है। यदि झील का पानी जहरीला हो रहा है, तो इसका असर आसपास के पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ना तय है।
- अधिकारियों की जवाबदेही: नगर निगम और चिड़ियाघर प्रशासन के बीच समन्वय की कमी साफ दिख रही है। शहर की एक महत्वपूर्ण धरोहर और पर्यटन स्थल की सुरक्षा में इतनी बड़ी चूक प्रशासन की गंभीरता पर सवाल उठाती है।
- बीमारी का डर: अगर झील का पानी नाले के कचरे से प्रदूषित हो रहा है, तो यह आने वाले दिनों में और भी बड़ी बीमारियों को न्योता दे सकता है। शहरवासियों के लिए यह जानना जरूरी है कि क्या उनके चिड़ियाघर का पानी सुरक्षित है?
चिड़ियाघर प्रशासन का कहना है कि अब 60 किलो टॉक्सिन बाइंडर का इस्तेमाल किया गया है और जल्द ही पानी की विस्तृत जांच कराई जाएगी। लेकिन, सवाल यह है कि क्या जब तक एक और बड़ी घटना नहीं होती, तब तक प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा रहेगा?




