उत्तर प्रदेश में सावन का महीना और कांवड़ यात्रा का उत्साह चरम पर है, लेकिन इस बार कांवड़ियों की सुरक्षा केवल भीड़ प्रबंधन तक सीमित नहीं है। प्रदेश के कई जिलों में वन विभाग के सामने एक ऐसी चुनौती खड़ी है जिससे निपटने में उनके पसीने छूट रहे हैं—तेंदुओं की बढ़ती मौजूदगी और उनके हमले का डर।
तेंदुओं का बसेरा और कांवड़ यात्रियों की राह
यूपी के बिजनौर, सहारनपुर और मेरठ जैसे इलाकों से गुजरने वाले कांवड़ रूट पर पिछले कुछ दिनों में तेंदुओं के देखे जाने की घटनाओं में अचानक इजाफा हुआ है। घने जंगलों से सटे मार्गों पर रात के सन्नाटे में जब कांवड़िए गुजरते हैं, तो उनकी सुरक्षा का संकट और गहरा जाता है। वन विभाग के आंकड़ों की मानें तो इन संवेदनशील क्षेत्रों में तेंदुओं की तादाद अब 500 के आंकड़े को छू रही है।
वन विभाग की बढ़ी सक्रियता, फिर भी डर बरकरार
वन विभाग ने कांवड़ रूट पर गश्त बढ़ा दी है और यात्रियों को सावधानी बरतने की सलाह दी जा रही है। वन कर्मियों की टीमें टॉर्च, लाठी और अन्य सुरक्षा उपकरणों के साथ तैनात की गई हैं, लेकिन जंगलों में फैली तेंदुओं की बड़ी आबादी के कारण किसी भी अनहोनी की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। अधिकारियों का कहना है कि वे लगातार निगरानी रख रहे हैं ताकि किसी भी जंगली जानवर के रिहायशी या धार्मिक रूट पर आने से पहले उसे खदेड़ा जा सके।
मायने और प्रभाव: आम जनता के लिए क्या है स्थिति?
यह मामला केवल वन विभाग के लिए चुनौती नहीं है, बल्कि यह श्रद्धालुओं की सुरक्षा का बड़ा प्रश्न है।
- सीधा प्रभाव: जंगली इलाकों से गुजरने वाले मार्गों पर शाम ढलते ही आवाजाही खतरनाक हो गई है।
- सतर्कता जरूरी: स्थानीय प्रशासन ने कांवड़ियों से अपील की है कि वे अकेले जंगलों की ओर न जाएं और समूह में ही यात्रा करें।
- संसाधनों की कमी: विभाग के पास मौजूद सीमित संसाधनों के सामने 500 तेंदुओं की मॉनिटरिंग करना एक बड़ी अग्निपरीक्षा है।
यह स्थिति बताती है कि विकास और पर्यावरण के बीच का असंतुलन किस कदर आम आदमी के दैनिक जीवन को प्रभावित कर रहा है। आने वाले दिनों में यात्रा के दौरान सतर्क रहना ही बचाव का एकमात्र रास्ता है।

