आईआईटी दिल्ली के दीक्षांत समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के भावी इंजीनियरों और वैज्ञानिकों के सामने एक नई चुनौती रखी है। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया है कि वे केवल समस्याओं को रेखांकित न करें, बल्कि उनके व्यावहारिक समाधान खोजने की दिशा में काम करें। पीएम ने साफ तौर पर कहा कि आने वाले 35 साल भारत के ‘विकसित भारत’ के संकल्प को पूरा करने के लिए सबसे निर्णायक हैं।
‘मैं बाबा बागेश्वर नहीं हूं’
समारोह के दौरान एक हल्के-फुल्के पल में पीएम मोदी ने छात्रों से संवाद करते हुए मजाकिया अंदाज में कहा, ‘आपके मन में क्या चल रहा है, ये मैं नहीं जान सकता, क्योंकि मैं बाबा बागेश्वर तो नहीं हूं।’ इस टिप्पणी के साथ ही हॉल तालियों और ठहाकों से गूंज उठा। पीएम का यह अंदाज युवाओं के साथ उनके जुड़ाव को दर्शाता है, लेकिन उन्होंने तुरंत ही गंभीर मुद्दों पर चर्चा का रुख किया।
अगले 35 साल क्यों हैं अहम?
पीएम मोदी ने छात्रों को याद दिलाया कि उनकी मेहनत और नवाचार ही भारत को वैश्विक शक्ति बनाएगा। उन्होंने कहा कि:
- युवाओं को लीक से हटकर सोचने की जरूरत है।
- समस्याओं का समाधान स्थानीय जरूरतों के हिसाब से होना चाहिए।
- भारत का तकनीकी भविष्य अब ग्लोबल बेंचमार्क सेट करने वाला होना चाहिए।
मायने और प्रभाव
पीएम मोदी का यह संबोधन सिर्फ छात्रों के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के युवाओं के लिए एक विजन है। इसका बड़ा संदेश यह है कि भारत अब आयातित तकनीक पर निर्भर रहने के बजाय अपनी समस्याओं को खुद हल करने वाली ‘आत्मनिर्भर’ अर्थव्यवस्था बन रहा है। छात्रों का स्किलसेट यदि देश की चुनौतियों (जैसे जलवायु परिवर्तन, जल संकट और कृषि तकनीक) से जुड़ेगा, तो इससे न केवल रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, बल्कि भारत की ग्लोबल रैंकिंग में भी सुधार होगा। आने वाले दशकों में यही पीढ़ी भारत की विकास गाथा लिखेगी।




