धान के खेतों में लहलहाती फसल हर किसान का सपना होती है, लेकिन इस बार मॉनसून की बेरुखी ने अन्नदाताओं की कमर तोड़ दी है। जिस उम्मीद के साथ किसानों ने कम पानी सोखने वाली उन्नत किस्मों का चुनाव किया था, अब वही किस्में भी खेतों में दम तोड़ती नजर आ रही हैं।
डीजल की बढ़ती कीमतें और सूखते खेत
बारिश न होने के कारण खेतों में दरारें पड़ गई हैं और धान की रोपाई के बाद भी नमी गायब है। मजबूरन किसानों को डीजल पंपों का सहारा लेना पड़ रहा है। लगातार सिंचाई के कारण डीजल का खर्च आसमान छू रहा है, जिससे खेती की लागत दोगुनी हो गई है।
भूजल स्तर में गिरावट और चुनौतियां
जमीन के अंदर पानी का स्तर इतना गिर चुका है कि पंपसेट को घंटों चलाना पड़ रहा है। इसके बाद भी फसलों को पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है। किसान अब आसमानी बारिश की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं, लेकिन मौसम विभाग की सुस्ती ने उनकी चिंताएं और बढ़ा दी हैं।
मायने और प्रभाव: आम किसान पर क्या असर?
इस संकट के सीधे दो बड़े प्रभाव सामने आ रहे हैं:
- आर्थिक बोझ: खेती में निवेश तो बढ़ा, लेकिन पैदावार कम होने की आशंका से किसानों पर भारी कर्ज का खतरा मंडरा रहा है।
- खाद्य सुरक्षा: अगर यही स्थिति बनी रही, तो धान के उत्पादन में भारी गिरावट आएगी, जिसका असर आने वाले समय में चावल की कीमतों पर पड़ना तय है।
यह महज एक फसल का नुकसान नहीं है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले किसानों की कमर तोड़ने वाली स्थिति है। अगर समय रहते राहत नहीं मिली, तो किसानों के लिए अगली फसल की तैयारी करना भी मुश्किल हो जाएगा।




