पाकिस्तान की नाकामी और भारत पर दबाव की राजनीति
सिंधु नदी का पानी पाकिस्तान के लिए सिर्फ एक संसाधन नहीं, बल्कि उसकी जीवन रेखा है। हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत द्वारा सिंधु जल संधि के नियमों के दायरे में रहकर उठाए गए कदमों ने पाकिस्तान में खलबली मचा दी है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री और वहां की फौज अब इस मुद्दे को ‘युद्ध’ की धमकियों के जरिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर भुनाने की कोशिश कर रही है।
LoC पर बढ़ती हलचल और ड्रोन का खतरा
खुफिया जानकारी के अनुसार, नियंत्रण रेखा (LoC) पर पाकिस्तान की तरफ से 35 से अधिक ड्रोन देखे गए हैं। यह हरकत उस वक्त तेज हुई है जब पाकिस्तान के भीतर पानी का संकट गहराता जा रहा है। अपनी आंतरिक विफलताओं और आर्थिक बदहाली से जनता का ध्यान हटाने के लिए पाकिस्तानी सेना भारत के खिलाफ एक बार फिर पुरानी साजिशों को हवा दे रही है।
क्या है 66 साल पुरानी सिंधु जल संधि का विवाद?
1960 में हुई सिंधु जल संधि के तहत भारत और पाकिस्तान के बीच पानी के बंटवारे का स्पष्ट फॉर्मूला तय था। भारत हमेशा से ही इस संधि का सम्मान करता आया है, लेकिन पाकिस्तान अब इसे अपनी सहूलियत के हिसाब से बदलने की जिद कर रहा है।

- भारत की ओर से हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स पर काम शुरू करना पाकिस्तान को ‘अस्तित्व का खतरा’ लग रहा है।
- पाकिस्तान का आरोप है कि भारत पानी रोककर उसे प्यासा मारना चाहता है, जबकि हकीकत ये है कि पाकिस्तान खुद अपने जल प्रबंधन में पूरी तरह विफल रहा है।
मायने और प्रभाव: यह खबर क्यों जरूरी है?
पाकिस्तान के सत्ताधारी और सेना का इस तरह युद्ध की धमकी देना उनकी हताशा को दर्शाता है। भारत के पास सिंधु नदी के पानी का जो हिस्सा है, उसका उपयोग करना हमारा कानूनी और अंतरराष्ट्रीय अधिकार है। पाकिस्तान की यह रणनीति केवल अपने देश की जनता को भारत के खिलाफ भड़काकर अपनी कुर्सी बचाने की है। आने वाले समय में सीमा पर तनाव और कूटनीतिक दबाव की स्थिति बनी रह सकती है, लेकिन भारत अब पहले की तरह किसी भी गीदड़भभकी में आने वाला नहीं है।


