मथुरा के बलदेव इलाके में इन दिनों किसान अपने खेतों की दुर्दशा देखकर खून के आंसू रो रहे हैं। महीनों की कड़ी मेहनत और उम्मीद के साथ बोई गई मक्का की फसल का ‘दिखावा’ तो पूरा है, लेकिन जब फसल काटने का समय आया तो किसानों के हाथ में सिर्फ निराशा लगी। भुट्टों के छिलके उतारते ही अंदर का नज़ारा देखकर किसानों की मेहनत पर पानी फिर गया।
बीज भंडार का दांव, किसानों का बुरा हाल
क्षेत्र के दर्जनों किसानों ने सरकारी बीज भंडार से मक्का के बीज बड़ी उम्मीदों के साथ खरीदे थे। उन्होंने खाद, पानी और कीटनाशकों पर भी भारी खर्च किया, यह सोचकर कि बंपर पैदावार से कर्ज का बोझ कम होगा। लेकिन खेत में खड़ी फसल ने ऐसा धोखा दिया कि किसान अब ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
भुट्टे तो बने, लेकिन दाने नहीं
फसल में भुट्टे तो पूरी तरह विकसित हुए हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि उन भुट्टों के अंदर दाने बने ही नहीं। यह कोई कुदरती मार नहीं, बल्कि घटिया बीज की समस्या है। एक-एक पौधे पर बड़ी मेहनत करने वाले किसान अब खाली भुट्टे हाथ में लेकर प्रशासन से गुहार लगा रहे हैं।
मायने और प्रभाव: किसानों के लिए क्या है स्थिति?
- आर्थिक तंगी: प्रति बीघा करीब 25 हजार रुपये का नुकसान किसानों की कमर तोड़ने के लिए काफी है। छोटे किसानों के लिए यह पूरी सीजन की कमाई का सफाया है।
- भरोसे का संकट: सरकारी बीज भंडार पर भरोसा करने वाले किसान अब इस कदर डरे हुए हैं कि अगली बुवाई को लेकर उनमें भारी संशय है।
- प्रशासनिक लापरवाही: बीज की गुणवत्ता की जांच न होना इस पूरे घटनाक्रम के लिए जिम्मेदार है। अब किसान प्रशासन से मुआवजे की मांग कर रहे हैं, ताकि वे अपना कर्ज चुका सकें।
यह मामला केवल एक क्षेत्र के नुकसान का नहीं है, बल्कि कृषि व्यवस्था की उन खामियों को उजागर करता है जो सीधे अन्नदाता की थाली छीन रही हैं।



