यूपी के अस्पतालों में चल रहा था काले धंधे का खेल
कानपुर और आसपास के जिलों में चल रहे किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट ने अब एक नया मोड़ ले लिया है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने इस पूरे मामले में मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी है, जिससे उन रसूखदारों की मुश्किलें बढ़ गई हैं जो अब तक कानून की नजरों से बचे हुए थे। लखनऊ स्थित ईडी के जोनल मुख्यालय ने कानपुर पुलिस से केस से जुड़े तमाम दस्तावेज और साक्ष्य तलब किए हैं।
क्या है पूरा मामला?
इस पूरे रैकेट का पर्दाफाश तब हुआ जब पुलिस ने पाया कि एक सुनियोजित सिंडिकेट बनाकर किडनी की खरीद-फरोख्त की जा रही थी। बिहार के बेगूसराय के आयुष और मेरठ की पारुल तोमर के ट्रांसप्लांट मामले ने इस काले चिट्ठे को खोलकर रख दिया। जांच में सामने आया कि प्रिया अस्पताल, मेडलाइफ अस्पताल और आहूजा अस्पताल जैसे संस्थानों का उपयोग इस गैर-कानूनी काम के लिए किया जा रहा था।
पुलिस की पकड़ से अभी भी दूर हैं ये चार चेहरे
पुलिस ने अब तक डॉ. सुरजीत सिंह आहूजा, डॉ. प्रीती आहूजा और शिवम अग्रवाल समेत कई लोगों को सलाखों के पीछे भेजा है। हालांकि, जांच की आंच के बावजूद चार मुख्य आरोपी अभी भी कानून की पकड़ से दूर हैं:
- अफजाल
- नवीन पांडेय
- डॉ. वैभव
- अनुराग
सूत्रों की मानें तो इन आरोपियों की संपत्तियों की पहचान के लिए ईडी ने सब-रजिस्ट्रार कार्यालयों को पत्र लिखे हैं, ताकि अवैध कमाई से बनाई गई संपत्तियों को कुर्क किया जा सके।
मायने और प्रभाव: आम जनता पर असर
ईडी की इस कार्रवाई के कई गंभीर मायने हैं। यह पहली बार नहीं है जब उत्तर प्रदेश में ऑर्गन ट्रांसप्लांट का काला कारोबार सामने आया है, लेकिन ईडी का शामिल होना यह बताता है कि यह केवल एक मेडिकल लापरवाही नहीं, बल्कि करोड़ों की मनी लॉन्ड्रिंग का संगठित अपराध है।
आम आदमी के लिए यह खबर एक चेतावनी है कि स्वास्थ्य सेवाओं की आड़ में चल रहे इन माफियाओं से सावधान रहने की जरूरत है। प्रशासन के लिए यह एक बड़ी चुनौती है कि कैसे पुलिस और ईडी मिलकर इस सिंडिकेट की जड़ों को पूरी तरह से काटते हैं। जनता की निगाहें अब फरार आरोपियों की गिरफ्तारी पर टिकी हैं।




