वाराणसी के कैंट रेलवे स्टेशन पर सोमवार का नजारा किसी युद्ध क्षेत्र से कम नहीं था। यूपी पुलिस भर्ती परीक्षा खत्म होते ही हजारों की संख्या में अभ्यर्थी रेलवे स्टेशन पर उमड़ पड़े, जिससे व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई। स्थिति यह थी कि आरक्षित टिकट वाले यात्री भी अपनी सीट तक नहीं पहुंच पा रहे थे।
ट्रेनों में ‘नोकझोंक’ और अफरा-तफरी का माहौल
परीक्षा देकर घर लौटने की जल्दी में अभ्यर्थी हर उस ट्रेन में घुस गए जो उन्हें सामने दिखी। गोरखपुर-लोकमान्य तिलक एक्सप्रेस हो या पवन एक्सप्रेस, स्लीपर से लेकर एसी कोच तक अभ्यर्थियों से खचाखच भर गए थे। गलियारे से लेकर टॉयलेट के पास तक लोगों की भीड़ के कारण पैर रखने की जगह नहीं थी।
इस आपाधापी के चलते पहले से रिजर्वेशन करा चुके यात्रियों की अभ्यर्थियों से तीखी नोकझोंक भी हुई। जीआरपी और आरपीएफ के जवानों ने हालात संभालने की कोशिश की, लेकिन भीड़ इतनी बेकाबू थी कि तमाम दावों के बावजूद व्यवस्था नाकाफी साबित हुई।
तैयारियों के दावों की खुली पोल
- परीक्षा के लिए पंजीकृत 44 हजार में से करीब 31 हजार अभ्यर्थियों ने पहले दिन परीक्षा दी।
- रेलवे की ओर से चलाई गई 4 स्पेशल ट्रेनें भी इस दबाव को झेलने में विफल रहीं।
- वाराणसी के सर्कुलेटिंग एरिया से लेकर प्लेटफॉर्म तक हर जगह सिर्फ अभ्यर्थी ही नजर आए।
मायने और प्रभाव: आम जनता के लिए क्यों है अहम?
यह घटना केवल भीड़ प्रबंधन की विफलता नहीं है, बल्कि उस बुनियादी ढांचे की सच्चाई भी बयां करती है जो अचानक आने वाले हजारों लोगों के दबाव को झेलने में अक्षम है। जब भी बड़े पैमाने पर सरकारी परीक्षाएं होती हैं, तो मध्यम वर्गीय यात्रियों को सबसे अधिक परेशानी झेलनी पड़ती है।
आरक्षित टिकट बुक करने के बाद भी अपनी सीट तक न पहुंच पाना रेलवे की सुरक्षा और यात्री सुविधा पर एक बड़ा सवालिया निशान है। आने वाले समय में अगर परीक्षा केंद्रों की संख्या और परिवहन के साधनों में तालमेल नहीं बैठाया गया, तो आम यात्रियों का ट्रेनों में सफर करना और भी कठिन होता जाएगा। प्रशासन के लिए अब यह अनिवार्य है कि बड़े आयोजनों के दौरान केवल कागजी इंतजाम न हों, बल्कि जमीनी स्तर पर यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।



