पूर्वांचल में कानून का खौफ: क्या माफियाओं का युग ढल गया?
उत्तर प्रदेश की सड़कों पर एक वक्त था जब बड़े-बड़े अपराधियों का नाम सुनकर लोग अपने घर के दरवाजे बंद कर लिया करते थे। लेकिन आज हालात बदल चुके हैं। पूर्वांचल के तीन मंडलों में फैले 11,577 हिस्ट्रीशीटरों की दुनिया अब अपराध की दहलीज से सिमटकर फल-सब्जी के ठेलों और कूड़ा बीनने तक आ गई है।
आंकड़े जो हैरान करते हैं
पुलिस के हालिया आंकड़ों के मुताबिक, पूर्वांचल में कुल 11,577 हिस्ट्रीशीटर दर्ज हैं। ये वो लोग हैं जो कभी अपराध की दुनिया के ‘बड़े खिलाड़ी’ माने जाते थे। इनमें से 479 हिस्ट्रीशीटर तो ऐसे हैं जो पुलिस की पकड़ से दूर हैं और लंबे समय से लापता चल रहे हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से कई अपनी पहचान छुपाने के लिए मेहनत-मजदूरी का सहारा ले रहे हैं। जिलेवार आंकड़ों की बात करें, तो आजमगढ़ में सबसे अधिक हिस्ट्रीशीटर मौजूद हैं, जबकि भदोही में इनकी संख्या सबसे कम दर्ज की गई है।
बदली हुई परिस्थिति और पुलिस की नजर
- सख्ती का असर: लगातार मॉनिटरिंग और अपराधियों की संपत्ति कुर्क करने की कार्रवाई ने इनका आर्थिक आधार खत्म कर दिया है।
- गुमनाम जीवन: डर के साये और पुलिस के दबाव के चलते कई हिस्ट्रीशीटर अब आम लोगों की तरह रोजी-रोटी कमाने में जुटे हैं।
- लापता बदमाशों की तलाश: 479 हिस्ट्रीशीटरों की लोकेशन ट्रेस न हो पाना पुलिस के लिए अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
मायने और प्रभाव: आम जनता पर असर
इस बदलाव के गहरे सामाजिक मायने हैं। पहली बार आम जनता अपराध के भय से मुक्त होकर सार्वजनिक जीवन जी रही है। जब एक अपराधी को मजबूरी में ठेला लगाना पड़ता है या कूड़ा बीनना पड़ता है, तो यह स्पष्ट संकेत है कि कानून का डर समाज में बहाल हुआ है। इससे न केवल स्थानीय बाजारों में सुरक्षा का माहौल बढ़ा है, बल्कि युवाओं को भी यह संदेश गया है कि अपराध का रास्ता अंततः बदहाली की ओर ही ले जाता है। हालांकि, पुलिस के लिए असली चुनौती उन 479 ‘लापता’ बदमाशों को ढूंढना है, जो शायद अभी भी किसी बड़ी साजिश की फिराक में हो सकते हैं।



