हिमालय की दुर्गम पहाड़ियों में ट्रैकिंग पर निकलीं बबीता की तलाश अब एक बड़े अभियान में तब्दील हो गई है। उत्तरकाशी के दयारा बुग्याल से डोडीताल के बीच का इलाका बेहद कठिन है, जहां बबीता पिछले कई दिनों से लापता हैं। स्थानीय प्रशासन और रेस्क्यू टीमों ने अब अपनी कोशिशों को नई धार देते हुए हवाई सर्वेक्षण का सहारा लेना शुरू कर दिया है।
हेलिकॉप्टर से हो रही चप्पे-चप्पे की निगरानी
जमीनी स्तर पर एसडीआरएफ (SDRF) और स्थानीय गाइडों की टीमें लगातार पैदल गश्त कर रही हैं, लेकिन बर्फबारी और खराब रास्तों के कारण तलाशी में भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इसी को देखते हुए अब हेलिकॉप्टर के जरिए उन ऊंचे इलाकों में निगरानी की जा रही है, जहां पहुंचना इंसान के लिए फिलहाल मुमकिन नहीं है। पायलट और पर्वतारोहियों की टीम उन संभावित रास्तों और घाटियों पर नजर गड़ाए हुए है, जहां बबीता के होने की हल्की सी भी संभावना है।
प्रशासन की प्राथमिकता और चुनौतियां
उत्तरकाशी का यह इलाका अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जितना मशहूर है, उतना ही खतरनाक भी। बबीता के परिवार का बुरा हाल है और पूरे राज्य की निगाहें इस सर्च ऑपरेशन पर टिकी हैं। जिला प्रशासन का कहना है कि मौसम की स्थिति को देखते हुए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। ड्रोन और सैटेलाइट इमेजरी की भी मदद ली जा रही है ताकि तलाशी का दायरा सटीक रहे।
मायने और प्रभाव: पर्वतारोहण में सुरक्षा की बड़ी सीख
यह घटना एक बार फिर से इस बात की ओर इशारा करती है कि हिमालय में ट्रैकिंग केवल शौकिया नहीं, बल्कि बेहद जोखिम भरा काम है। बबीता के लापता होने से यह साफ है कि:
- ट्रैकिंग नियमों का पालन: किसी भी एडवेंचर ट्रिप पर जाने से पहले प्रशासन को सूचना देना और अनुभवी गाइड साथ रखना अनिवार्य है।
- मौसम की अनिश्चितता: पहाड़ों में मौसम कब बदल जाए, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है, इसलिए हमेशा आपातकालीन स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए।
- सुरक्षा प्रोटोकॉल: इस तरह की घटनाएं राज्य सरकार को ट्रैकिंग रूट पर बेहतर नेटवर्क और रेस्क्यू सिस्टम विकसित करने के लिए मजबूर करती हैं।
आम जनता के लिए यही सलाह है कि पहाड़ की चुनौतियों को कभी हल्के में न लें। बबीता की सुरक्षित वापसी की उम्मीद पूरी घाटी कर रही है, और उम्मीद है कि रेस्क्यू टीम का यह व्यापक अभियान जल्द ही कोई सकारात्मक नतीजा लेकर आएगा।



