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हाथरस में रिश्तों का कड़वा सच: बहुओं के जुल्म से तंग आकर थाने पहुंचे बुजुर्ग दंपती, सुनाई आपबीती

हाथरस में शर्मसार हुई ममता: बहुओं के प्रताड़ना की कहानी

हाथरस की गलियों से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने रिश्तों की मर्यादा और पारिवारिक संवेदनाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां एक वृद्ध दंपती ने अपने ही घर की चौखट छोड़ पुलिस की शरण लेने का फैसला किया। आरोप है कि उनके अपने ही बेटे-बहुओं ने उन्हें जीने के लिए मोहताज कर दिया है।

बुजुर्ग सावित्री देवी और उनके पति ने पुलिस को दी गई शिकायत में बताया है कि घर में उन्हें दो वक्त की रोटी के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। बहुएं न केवल उन्हें समय पर खाना नहीं देतीं, बल्कि मानसिक रूप से भी प्रताड़ित करती हैं।

धुएं के बीच दम तोड़ता बुढ़ापा

सावित्री देवी की आंखों में आंसू और व्यथा साफ झलक रही थी। उन्होंने बताया कि उनकी आंखों का मोतियाबिंद का ऑपरेशन हुआ था, जिसके बाद उन्हें धूल और धुएं से बचने की सख्त हिदायत दी गई थी। इसके बावजूद, बहुओं ने उन्हें जबरन चूल्हे पर खाना बनाने को मजबूर किया।

नतीजा यह हुआ कि धुएं की चपेट में आकर उनकी एक आंख की रोशनी फिर से प्रभावित हो गई है। घर में रहते हुए भी वे एक ऐसे अंधेरे की ओर धकेले जा रहे हैं, जहां न तो प्रेम है और न ही सम्मान।

मायने और प्रभाव: समाज के लिए आईना

  • गिरते पारिवारिक मूल्य: यह घटना दिखाती है कि कैसे संयुक्त परिवारों का ताना-बाना तेजी से बिखर रहा है और बुजुर्ग उपेक्षा के शिकार हो रहे हैं।
  • कानूनी अधिकार: माता-पिता का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम के तहत बुजुर्गों को प्रताड़ना से बचने का पूरा हक है।
  • सामाजिक चेतना: इस मामले ने हाथरस में वृद्धों की सुरक्षा को लेकर एक गंभीर बहस छेड़ दी है, जहां प्रशासन की भूमिका और भी अहम हो जाती है।

यह मामला महज एक घरेलू कलह नहीं, बल्कि उस बढ़ती संवेदनहीनता का परिणाम है जो आज के दौर में बुजुर्गों के बुढ़ापे को अभिशाप बना रही है। क्या हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहां अपने ही माता-पिता का बोझ उठाना मुश्किल होता जा रहा है?

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