इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के हजारों दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के भविष्य को सुरक्षित करने वाला एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी कर्मचारी की नियमित सेवा से पहले की दैनिक वेतन सेवा को पेंशन की गणना से बाहर नहीं रखा जा सकता।
क्या है पूरा मामला?
राज्य सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की एकल पीठ के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें कोर्ट ने दैनिक वेतन पर कार्यरत रहे कर्मचारियों की पिछली सेवा को पेंशन योग्य सेवा में जोड़ने का निर्देश दिया था। सरकार का तर्क था कि पेंशन केवल नियमित सेवा के आधार पर तय होती है, लेकिन अदालत ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया।
कोर्ट की टिप्पणी: सेवा का सम्मान जरूरी
जस्टिस ने अपने आदेश में कहा कि जो कर्मचारी वर्षों तक दैनिक वेतन पर विभाग की सेवा करते रहे हैं, उनकी मेहनत को दरकिनार नहीं किया जा सकता। यदि कोई कर्मचारी लंबी अवधि तक दैनिक वेतन भोगी के रूप में कार्यरत रहा है और बाद में नियमित हुआ है, तो उस पूरी अवधि को उसकी ‘क्वालीफाइंग सर्विस’ माना जाना अनिवार्य है।

आम कर्मचारियों पर क्या होगा असर?
- पेंशन में बढ़ोतरी: जो कर्मचारी अब रिटायर हो रहे हैं, उनकी पेंशन राशि में बड़ा इजाफा होगा।
- पुराने कर्मचारियों को राहत: वर्षों से नियमितीकरण की बाट जोहने वाले कर्मचारियों के लिए यह एक बड़ी कानूनी जीत है।
- सरकारी विभागों पर दबाव: अब राज्य के विभिन्न विभागों को उन सभी कर्मचारियों की पेंशन फाइलें फिर से देखनी होंगी, जो दैनिक वेतन पर अपनी सेवा शुरू कर चुके थे।
मायने और प्रभाव
यह फैसला न केवल कानूनी रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह उन हजारों परिवारों के लिए उम्मीद की किरण है, जिन्होंने अपनी जवानी सरकारी विभागों में दैनिक वेतन भोगी के तौर पर बिता दी। सरकार अब इस आदेश के बाद उन सभी कर्मचारियों को पेंशन लाभ देने के लिए बाध्य है, जिन्हें पहले केवल ‘नियमित’ अवधि के आधार पर मामूली लाभ मिलता था। यह फैसला प्रशासन को यह याद दिलाता है कि सेवा की अवधि केवल नियुक्ति पत्र से नहीं, बल्कि कर्मचारी द्वारा दिए गए वर्षों के श्रम से तय होती है।




