डिजिटल युग में जब बच्चे मोबाइल की स्क्रीन पर घंटों बिता रहे हैं, तब उत्तर प्रदेश के पीएमश्री स्कूलों में एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है। अब इन स्कूलों के क्लासरूम में स्मार्टफोन्स की जगह अखबारों और पत्रिकाओं की गंध महसूस होगी। सरकार ने बच्चों में पढ़ने की आदत को बढ़ावा देने के लिए एक अनूठी पहल शुरू की है, जिससे न केवल उनकी भाषाई पकड़ मजबूत होगी, बल्कि रटने की प्रवृत्ति से भी उन्हें छुटकारा मिलेगा।
मोबाइल की लत से मुक्ति का ‘अखबार प्लान’
शिक्षा विभाग ने राज्य के सभी पीएमश्री स्कूलों को निर्देश दिए हैं कि वे छात्रों को अखबार पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें। इस योजना के तहत प्रत्येक विद्यालय को हर साल 5,000 रुपये का बजट दिया जाएगा, जिसका उपयोग केवल समाचार पत्र और ज्ञानवर्धक पत्रिकाएं खरीदने में होगा।
यह कवायद इसलिए भी अहम है क्योंकि वर्तमान में छात्रों का स्क्रीन टाइम लगातार बढ़ रहा है। किताबों से बाहर निकलकर दुनिया को अखबार के पन्नों के जरिए देखने से बच्चों में तार्किक क्षमता और समसामयिक विषयों की समझ विकसित होगी।
कैसे सुधरेगी बच्चों की भाषा?
- शब्दकोश में वृद्धि: अखबारों की भाषा मानक और शुद्ध होती है, जिससे बच्चों की शब्दावली बेहतर होगी।
- रचनात्मक सोच: संपादकीय और लेख पढ़ने से बच्चों में विषयों को विश्लेषण करने की क्षमता बढ़ेगी।
- तनाव में कमी: स्क्रीन के लगातार इस्तेमाल से होने वाली आंखों की थकान और मानसिक दबाव कम होगा।
मायने और प्रभाव: आम जनता के लिए क्यों जरूरी है?
इस पहल का सबसे बड़ा प्रभाव छात्रों की ‘एनालिटिकल स्किल्स’ पर पड़ेगा। आज के दौर में इंटरनेट पर जानकारी की बाढ़ है, लेकिन अखबार बच्चों को ‘सही और सटीक’ जानकारी फिल्टर करना सिखाते हैं। यह केवल पढ़ाई का तरीका नहीं, बल्कि बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण का एक बड़ा कदम है।
अभिभावकों के लिए यह राहत की बात है कि स्कूल अब बच्चों के हाथ में टैबलेट की जगह अखबार थमाने की वकालत कर रहे हैं। यदि यह प्रयोग सफल रहा, तो उत्तर प्रदेश के पीएमश्री स्कूल आने वाली पीढ़ी को डिजिटल शोर से दूर, असल दुनिया के प्रति जागरूक बनाने में मील का पत्थर साबित होंगे।




