जून की तपती दोपहर में आम आदमी का बस एक ही सवाल है- आखिर मानसून गया कहां? देश के 19 राज्यों में बादलों की लुका-छिपी ने किसानों से लेकर आम जनता तक की चिंता बढ़ा दी है। आसमान से बरसती आग और बारिश का लंबा इंतजार अब एक बड़े संकट की ओर इशारा कर रहा है।
मानसून के सुस्त पड़ने की असल वजह
मौसम विभाग (IMD) की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल मानसून की रफ्तार उम्मीद से काफी धीमी रही है। 7 राज्यों में तो हालात ये हैं कि सामान्य से 60 फीसदी तक कम बारिश दर्ज की गई है। उत्तर प्रदेश, बिहार समेत 7 राज्यों में पारा अभी भी 40 डिग्री सेल्सियस के पार बना हुआ है, जिससे जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त है।
क्यों अटका है मानसून?
- कमजोर समुद्री हवाएं: मानसून को आगे धकेलने वाली अरब सागर की हवाओं में इस बार जोश की कमी देखी गई है।
- तापमान का असंतुलन: जमीन और समुद्र के तापमान में वो अंतर नहीं बन पा रहा, जो बादलों को देश के भीतर खींच सके।
- अल-नीनो का असर: वैश्विक मौसम चक्र में हो रहे बदलाव मानसून के मार्ग में बाधा डाल रहे हैं।
मायने और प्रभाव: आम जनता पर असर
मानसून की यह देरी सिर्फ मौसम का मिजाज नहीं है, बल्कि यह सीधे आपकी जेब और थाली पर असर डालने वाली है। खेती-किसानी के लिए मानसून की पहली फुहारें संजीवनी होती हैं। बुवाई का समय निकलता जा रहा है, जिसका सीधा असर आने वाले महीनों में सब्जियों और अनाज की कीमतों पर पड़ेगा। बिजली की मांग भी रिकॉर्ड तोड़ रही है, जिससे बिजली कटौती का खतरा सिर पर मंडरा रहा है। अगले कुछ दिनों में महाराष्ट्र और तेलंगाना में मानसून के सक्रिय होने की उम्मीद है, लेकिन उत्तर भारत को राहत के लिए अभी थोड़ा और धैर्य रखना होगा।




