गंगा के रौद्र रूप ने कानपुर के पांच गांवों में ऐसी लकीर खींची है, जिसे मिटाने में किसानों को अब लंबा वक्त लगेगा। करीब 20 दिन पहले जब गंगा का जलस्तर बढ़ा, तो सिर्फ पानी ही नहीं भरा, बल्कि सैकड़ों किसानों की उम्मीदें भी डूब गईं। अब जब पानी उतरा है, तो खेतों में सिर्फ बर्बादी के निशान और सड़ी हुई फसलें बची हैं।
पांच गांवों में पसरा सन्नाटा और मायूसी
प्रशासनिक सर्वे के मुताबिक, सदर तहसील के हिंदूपुर, चिरान, प्रतापपुर हरि, कटरी खेड़ा और पृथ्वीगंज गांव बाढ़ की चपेट में सबसे बुरी तरह आए। यहां के 390 किसानों की मेहनत से लहलहा रही 6.20 हेक्टेयर फसल पूरी तरह चौपट हो गई है। कुल मिलाकर करीब 40 हेक्टेयर कृषि भूमि पर बाढ़ का बुरा असर पड़ा है।
बाढ़ के दौरान स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि 50 से अधिक परिवारों को अपना घर-बार छोड़कर जान बचाने के लिए सुरक्षित ठिकानों की ओर रुख करना पड़ा था। आज किसान जब अपने खेतों की ओर लौट रहे हैं, तो उनके हाथ सिर्फ बर्बादी लग रही है।
क्या-क्या हुआ है नुकसान?
सर्वे में यह बात सामने आई है कि बाढ़ ने न केवल धान या गेहूं, बल्कि नकदी फसलों को भी भारी नुकसान पहुंचाया है। किसानों की मेहनत से तैयार लौकी, तरोई और भिंडी जैसी सब्जियां पानी में गल चुकी हैं। लेखपालों की टीम ने जमीन पर उतरकर बारीकी से नुकसान का आकलन किया है।
- प्रभावित किसान: 390
- कुल फसल नष्ट: 6.20 हेक्टेयर
- कुल प्रभावित भूमि: 40 हेक्टेयर
मायने और प्रभाव: किसानों के लिए आगे की राह
यह तबाही केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उन परिवारों की आर्थिक रीढ़ टूटने की कहानी है जो पूरी तरह से खेती पर निर्भर हैं। सरकारी नियमानुसार, फसल क्षति पर 17,500 रुपये प्रति हेक्टेयर की दर से मुआवजे का प्रावधान है। एडीएम वित्त डॉ. विवेक चतुर्वेदी ने आश्वासन दिया है कि रिपोर्ट शासन को भेज दी गई है और जल्द ही मुआवजा राशि सीधे किसानों के खाते में भेजी जाएगी।
स्थानीय स्तर पर अब चिंता इस बात की है कि यह मुआवजा समय पर मिले, ताकि किसान अगली बुवाई के लिए बीज और खाद का इंतजाम कर सकें। प्रशासन की यह त्वरित कार्रवाई ही उन किसानों को फिर से खेतों में वापस लाने की हिम्मत दे सकती है जिनकी पूरी जमा-पूंजी गंगा की लहरों ने छीन ली है।




