स्मार्ट सिटी गोरखपुर के नगर निगम ने शहर की समस्याओं को सुलझाने के लिए डिजिटल तकनीक का सहारा तो लिया, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से कोसों दूर दिख रही है। अब शहरवासी टोल-फ्री नंबर और ऑनलाइन पोर्टल के जरिए अपनी शिकायतें तो दर्ज करा पा रहे हैं, मगर समाधान के नाम पर उन्हें आज भी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
डिजिटल शिकायतों का बढ़ता अंबार
गोरखपुर नगर निगम ने नागरिक सुविधाओं को पारदर्शी बनाने के लिए ऑनलाइन पोर्टल और टोल-फ्री नंबर शुरू किए थे। इसका मुख्य उद्देश्य सफाई, जलभराव और स्ट्रीट लाइट जैसी शिकायतों का त्वरित निस्तारण करना था। शुरुआत में लोगों ने इसे बड़ी राहत माना था, लेकिन अब पोर्टल पर दर्ज शिकायतों की पेंडिंग लिस्ट लंबी होती जा रही है।
शिकायतें दर्ज, समाधान का अता-पता नहीं
- पोर्टल पर शिकायत डालने के बाद अक्सर ‘प्रोसेसिंग’ का मैसेज दिखाई देता है।
- सप्ताह बीत जाने के बाद भी समाधान न मिलने से लोग हताश हैं।
- टोल-फ्री नंबर पर फोन करने पर संतोषजनक जवाब नहीं मिलता।
आम जनता का कहना है कि डिजिटल सिस्टम केवल एक औपचारिकता बनकर रह गया है। शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया तो सरल है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी या कर्मचारी समय पर मौके पर नहीं पहुँचते।

मायने और प्रभाव: आम जनता पर असर
इस डिजिटल विफलता के गहरे मायने हैं। जब सरकार ‘ई-गवर्नेंस’ और ‘स्मार्ट सिटी’ की बात करती है, तो उम्मीद यह होती है कि आम आदमी का समय बचेगा। लेकिन यदि सिस्टम होने के बावजूद व्यक्ति को फिजिकल रूप से शिकायतों के लिए भागना पड़े, तो सरकारी तंत्र पर से भरोसा कम होता है। यह सिर्फ एक तकनीकी चूक नहीं, बल्कि जवाबदेही (Accountability) की कमी को भी दर्शाता है। आने वाले समय में नगर निगम को केवल सॉफ्टवेयर अपडेट करने की नहीं, बल्कि अपने फील्ड स्टाफ को सक्रिय करने की जरूरत है, तभी जनता को असल राहत मिल पाएगी।



