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गोरखपुर के किसानों के लिए राहत: सिंचाई के ये 2 नुस्खे बचाएंगे पानी और बढ़ाएंगे मुनाफा

गोरखपुर में घटता भूजल: किसानों के लिए बड़ी चुनौती

गोरखपुर और आसपास के जिलों में धान की बुवाई का सीजन शुरू होते ही किसानों की चिंताएं बढ़ जाती हैं। एक तरफ फसल के लिए भरपूर पानी की दरकार होती है, तो दूसरी तरफ गिरता भूजल स्तर और सूखते नलकूप उम्मीदों पर पानी फेर रहे हैं। क्या आप भी अपनी फसल को बचाने के लिए महंगे डीजल और बिजली के भारी बिल से परेशान हैं?

पानी की बचत के लिए ‘स्मार्ट’ खेती

कृषि विशेषज्ञ अनुपम दुबे बताते हैं कि अब पारंपरिक सिंचाई के तरीके को बदलने का वक्त आ गया है। धान की खेती में पानी की बर्बादी रोकने के लिए ये दो तरीके गेम-चेंजर साबित हो सकते हैं:

  • मल्चिंग तकनीक: फसल की जड़ों के चारों ओर पराली या सूखी पत्तियों की परत बिछाने से मिट्टी की नमी लंबे समय तक बनी रहती है। इससे वाष्पीकरण कम होता है और आपको बार-बार सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती।
  • वर्षा जल संचयन और नमी संरक्षण: अपने खेतों के कोनों पर छोटे गड्ढे बनाकर बारिश के पानी को सहेजें। इसे ‘ड्राई लैंड एग्रीकल्चर’ का मुख्य आधार माना जाता है, जो सूखे के समय संजीवनी का काम करता है।

मायने और प्रभाव: किसानों के लिए क्यों जरूरी है यह बदलाव?

यह जानकारी सिर्फ खेती के तरीकों में बदलाव नहीं है, बल्कि यह आपकी जेब पर पड़ने वाले बोझ को कम करने का एक जरिया है। जब आप मल्चिंग और जल संरक्षण जैसी तकनीकें अपनाते हैं, तो सिंचाई की लागत में सीधे 20 से 30 फीसदी तक की कमी आती है। साथ ही, गिरते भूजल स्तर के बीच यह जिम्मेदारी आपकी भी है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी सुरक्षित रहे। गोरखपुर के किसान यदि आज इन वैज्ञानिक तरीकों को अपनाते हैं, तो भविष्य में सूखे के खतरे से काफी हद तक सुरक्षित रह पाएंगे।

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