आगरा के किसान इस समय एक दोहरी मार झेलने को मजबूर हैं। खेतों में बुवाई का समय सिर पर है, लेकिन खाद की दुकानों और सरकारी सहकारी समितियों के चक्कर काटते-काटते किसानों की चप्पलें घिस गई हैं। डीएपी (DAP) खाद के लिए दर-दर भटक रहे अन्नदाता अब सिस्टम की लापरवाही और कालाबाजारी के खिलाफ सड़क पर उतरने को मजबूर हैं।
समितियों पर ताले, सचिव नदारद
हालत यह है कि कौलारा कलां, जैंगारा और अभैंदापुरा जैसी सहकारी समितियों पर ताले लटके हुए हैं। किसान सुबह से लाइन में लगकर इंतजार करते हैं, लेकिन न तो उन्हें खाद मिल रही है और न ही जिम्मेदार सचिव का पता है। कई किसानों का आरोप है कि जब भी मौका मिलता है, उनसे मनमानी वसूली की जाती है।
1350 के बैग पर 20 रुपये की ‘अवैध’ वसूली
सरकारी रेट 1350 रुपये प्रति बैग निर्धारित होने के बावजूद, किसानों से कथित तौर पर 20 रुपये अतिरिक्त वसूले जा रहे हैं। नाम न छापने की शर्त पर एक किसान ने बताया कि अगर हम विरोध करते हैं, तो हमें खाद न देने की धमकी दी जाती है। मजबूरी का फायदा उठाकर की जा रही यह अवैध उगाही सीधे तौर पर गरीब किसानों की जेब पर डाका है।
मायने और प्रभाव: किसानों का क्या होगा?
- बुवाई पर असर: खाद न मिलने से रबी की फसलों की बुवाई पिछड़ रही है, जिसका सीधा असर उत्पादन और किसानों की आय पर पड़ेगा।
- प्रशासनिक विफलता: जिला प्रशासन और कृषि विभाग की लचर निगरानी का खामियाजा उन किसानों को भुगतना पड़ रहा है, जिनकी पूरी अर्थव्यवस्था खेती पर टिकी है।
- ब्लैकमार्केटिंग का जाल: अगर समय रहते सरकारी समितियों में खाद की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं की गई, तो मजबूर किसान निजी दुकानों से महंगी खाद खरीदने को मजबूर होंगे, जो उनकी लागत को कई गुना बढ़ा देगा।
सवाल यह है कि आखिर ये ‘गायब’ सचिव किसके संरक्षण में काम कर रहे हैं? जिम्मेदार अधिकारियों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी, क्योंकि आगरा का किसान अब और इंतजार करने की स्थिति में नहीं है।


