अलीगढ़ की गलियों में एक ऐसी कहानी है जो हर किसी का दिल झकझोर कर रख देती है। सत्यवती नाम की एक महिला पिछले 17 वर्षों से अपने लापता पति की वापसी का इंतजार कर रही है। घर की दहलीज पर टिकी उनकी निगाहें आज भी उसी शख्स को ढूंढती हैं, जो एक मामूली घरेलू झगड़े के बाद घर से निकला और फिर कभी वापस नहीं लौटा।
क्या था वो मनहूस दिन?
यह घटना तब की है जब सत्यवती का बेटा केवल तीन महीने का था। पति-पत्नी के बीच हुई एक छोटी सी अनबन के बाद सत्यवती मायके चली गई थीं। कुछ दिनों बाद जब वह लौटीं, तो घर खाली मिला। पति न तो घर पर थे और न ही उनके बारे में कोई जानकारी आसपास के लोगों को थी। तब से आज तक, सत्यवती ने दर-दर की ठोकरें खाईं, लेकिन उनके पति का कहीं कोई पता नहीं चला।
बेटा अब पूछता है पिता के सवाल
आज वह तीन महीने का बच्चा 17 साल का हो चुका है और इंटरमीडिएट की पढ़ाई कर रहा है। पिता का चेहरा न देख पाने का दर्द अब उस बेटे के सवालों में झलकता है। वह अक्सर अपनी मां सत्यवती से पूछता है कि ‘पिता कहां हैं और क्यों नहीं आए?’ बेटा अब अपनी मां को हिम्मत देता है और अधिकारियों के पास जाकर पिता को ढूंढने की जिद करता है।

मायने और प्रभाव
इस दुखद कहानी के सामाजिक मायने गहरे हैं। यह मामला न केवल एक लापता व्यक्ति की त्रासदी है, बल्कि एक अकेली महिला के संघर्ष की गाथा भी है जिसने वर्षों तक सामाजिक और आर्थिक तंगी के बीच अपने बच्चे को पाला है।
- कानूनी बेबसी: वर्षों तक कोई सुराग न मिलना पुलिसिया तंत्र की विफलता को भी दर्शाता है।
- मानवीय संवेदना: एक परिवार का बिखरना सिर्फ कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि एक गहरा मानसिक घाव है।
- भविष्य की उम्मीद: बेटा अब पिता को ढूंढने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को तैयार है, जो इस केस में एक नई कानूनी हलचल पैदा कर सकता है।




