उन्नाव के गंगा एक्सप्रेसवे पर एक ऐसा मंजर दिखा जिसे देखकर किसी की भी रूह कांप जाए। प्रयागराज से निकले चार दोस्त अपनी मस्ती में सफर तय कर रहे थे, लेकिन एक पल की बेफिक्री और 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार ने उनकी जिंदगी की डोर हमेशा के लिए तोड़ दी। आसीवन थाना क्षेत्र में हुई यह दुर्घटना एक बार फिर हमें चेतावनी दे रही है कि एक्सप्रेसवे की रफ्तार का नशा कितना जानलेवा हो सकता है।
क्या हुआ उस मनहूस सुबह?
प्राथमिक जांच में सामने आया है कि कार की गति इतनी तेज थी कि ट्रक से टकराते ही उसके एयरबैग्स तो खुल गए, लेकिन कार का ढांचा पूरी तरह पिचक गया। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, चालक को संभवत: झपकी आ गई थी, जिससे कार बेकाबू होकर सड़क किनारे खड़े एक खराब ट्रक में जा घुसी। भीषण टक्कर के बाद कार के परखच्चे उड़ गए और अंदर सवार चारों दोस्तों ने मौके पर ही दम तोड़ दिया।
मदद की कमी और बुनियादी सुविधाओं का अभाव
इस हादसे ने हाईवे पर सुरक्षा इंतजामों की पोल खोल दी है। घटनास्थल के आसपास कोई भी ‘यू-टर्न’ या ‘कट’ न होना बचाव कार्य में सबसे बड़ी बाधा बना। इतना ही नहीं, एक्सप्रेसवे के इस हिस्से में किसी नजदीकी अस्पताल का न होना घायलों को ‘गोल्डन ऑवर’ में उपचार मिलने से रोकता है। एंबुलेंस पहुंचने तक बहुत देर हो चुकी थी।
मायने और प्रभाव: आम लोगों के लिए सबक
यह घटना सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए आईना है जो लंबी दूरी की यात्रा पर निकलते हैं। इसके प्रभाव और सबक साफ हैं:
- झपकी मौत का बुलावा: लंबी दूरी की यात्रा में अगर नींद महसूस हो, तो जबरदस्ती ड्राइव करना खतरनाक है। हर 2-3 घंटे में ब्रेक लेना अनिवार्य है।
- रफ्तार बनाम सुरक्षा: एक्सप्रेसवे पर 120 की स्पीड का मतलब है कि आपके पास प्रतिक्रिया देने (Reaction Time) का कोई मौका नहीं बचता।
- इमरजेंसी प्रोटोकॉल: सरकार और प्रशासन को एक्सप्रेसवे पर ट्रॉमा सेंटर और एंबुलेंस रिस्पॉन्स टाइम को और अधिक चुस्त करने की जरूरत है, ताकि ऐसे मामलों में जान बचाई जा सके।
आज चार परिवार उजड़ गए हैं। प्रशासन को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में ऐसे रास्तों पर सड़क किनारे खड़े खराब वाहनों को समय पर हटाया जाए और आपातकालीन सहायता की दूरी कम हो।



