लखनऊ के प्रतिष्ठित एसजीपीजीआई (SGPGI) में नर्सिंग और हॉस्पिटल अटेंडेंट की भर्ती प्रक्रिया में बड़ा खेल सामने आया है। हज़ारों युवाओं के सपनों को उस वक्त बड़ा झटका लगा जब भर्ती परीक्षा को बीच में ही रद्द करना पड़ा। हैरानी की बात यह है कि परीक्षा में सेंधमारी की साजिश किसी बाहरी ने नहीं, बल्कि सिस्टम के भीतर बैठे लोगों और परीक्षा कराने वाली कंपनी की मिलीभगत से रची गई थी।
पास कराने का ‘ठेका’ और सर्वर की साजिश
जांच में सामने आया है कि गिरोह ने अभ्यर्थियों से परीक्षा पास कराने के नाम पर लाखों रुपये वसूले थे। जैसे ही प्रशासन ने सुरक्षा घेरा सख्त किया और बायोमीट्रिक सत्यापन (Biometric Verification) को अनिवार्य किया, साजिशकर्ताओं के पैर उखड़ गए। अपनी पोल खुलने के डर से गिरोह ने सर्वर को ही डाउन कर दिया, ताकि बायोमीट्रिक अटेंडेंस न हो सके और परीक्षा की विश्वसनीयता खत्म हो जाए।
एसटीएफ (STF) के निशाने पर कौन?
मामले की गंभीरता को देखते हुए अब उत्तर प्रदेश की एसटीएफ ने मोर्चा संभाल लिया है। किन बिंदुओं पर जांच हो रही है:
- कंपनी की भूमिका: परीक्षा कराने वाली आउटसोर्सिंग एजेंसी के कर्मचारियों की भूमिका की जांच हो रही है।
- सर्वर में सेंध: सर्वर क्यों और कैसे डाउन हुआ, इसके पीछे की डिजिटल फॉरेंसिक जांच की जा रही है।
- आर्थिक लेनदेन: अभ्यर्थियों से लिए गए पैसे का ट्रेल पता लगाने के लिए बैंक खातों को खंगाला जा रहा है।
मायने और प्रभाव
यह घटना केवल एक भर्ती परीक्षा का रद्द होना नहीं है, बल्कि यह उन लाखों युवाओं के भरोसे का कत्ल है जो दिन-रात एक कर तैयारी करते हैं। जब भी भर्ती प्रक्रियाओं में इस तरह की धांधली होती है, तो उसका सीधा असर सिस्टम की पारदर्शिता पर पड़ता है।
आम जनता के लिए मायने: यदि परीक्षा कराने वाली एजेंसियां ही भ्रष्ट हो जाएंगी, तो आम गरीब छात्र कभी भी योग्यता के दम पर नौकरी नहीं पा पाएगा। एसटीएफ की जांच अब इस बात पर केंद्रित है कि क्या यह कोई संगठित रैकेट है जो पूरे प्रदेश की भर्तियों को प्रभावित कर रहा है। आने वाले दिनों में कई बड़े चेहरे बेनकाब हो सकते हैं, जिससे सरकारी नौकरियों की निष्पक्षता पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।


