हाथरस सहित पूरे देश में आज माताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण व्रतों में से एक ‘अहोई अष्टमी’ मनाई जा रही है। अपनी संतान की खुशहाली, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना के लिए महिलाएं निर्जला व्रत रखकर अहोई माता की विशेष आराधना कर रही हैं।
पूजा का शुभ मुहूर्त और समय
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अहोई अष्टमी का व्रत मुख्य रूप से तारों को देखने के बाद ही संपन्न होता है। इस साल पूजा के लिए 78 मिनट का अत्यंत शुभ मुहूर्त मिल रहा है। माताओं को इस दौरान अहोई माता की प्रतिमा के सामने बैठकर कथा सुननी चाहिए और तारों को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करना चाहिए।
व्रत की विधि और महत्व
अहोई अष्टमी पर माताएं पूरे दिन अन्न-जल त्याग कर संतान के प्रति अपना निस्वार्थ प्रेम व्यक्त करती हैं। इस दिन की मुख्य रस्में इस प्रकार हैं:
- दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाकर या कैलेंडर रखकर पूजा करना।
- सेव, फल और मिठाई का भोग लगाना।
- शाम को तारों को अर्घ्य देकर ही भोजन ग्रहण करना।
मायने और प्रभाव: आम जनता के लिए क्यों है जरूरी?
अहोई अष्टमी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति में मातृत्व के प्रति गहरा सम्मान दर्शाती है। आधुनिक भागदौड़ भरी जिंदगी में, यह दिन परिवार को एक साथ लाने और आने वाली पीढ़ी के प्रति जिम्मेदारी का एहसास कराने का जरिया बनता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के व्रत न केवल मानसिक शांति देते हैं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक रिश्तों में भी मजबूती लाते हैं। हाथरस और आसपास के क्षेत्रों में इस पर्व को लेकर महिलाओं में काफी उत्साह देखा जा रहा है, जो स्थानीय परंपराओं को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।




