बृहस्पतिवार की रात बरेली के आसमान में जैसे ही चंद्रमा ने अपनी पहली झलक दिखाई, शहर की फिजाओं में श्रद्धा और उत्साह का सैलाब उमड़ पड़ा। पूरे दिन निर्जला रहकर अपने पति की लंबी उम्र और परिवार की खुशहाली के लिए मन्नतें मांगने वाली सुहागिनों के चेहरे चांद को देखते ही खिल उठे।
बरेली में आस्था का उमड़ा सैलाब
बरेली के घरों से लेकर मंदिरों तक, करवाचौथ का पर्व एक खास रौनक के साथ मनाया गया। शाम ढलते ही शहर की महिलाओं ने सोलह शृंगार किया और पारंपरिक परिधानों में सज-धजकर पूजा की थाली तैयार की। रात करीब 8:04 बजे जैसे ही चंद्रोदय हुआ, छतों और बाल्कोनियों में छलनी से चांद का दीदार करने और फिर पति का चेहरा देखने की होड़ सी मच गई।
मंदिरों में दिखी विशेष रौनक
इस बार श्री हरि मंदिर और बांके बिहारी मंदिर में सामूहिक पूजा का दृश्य बेहद मनमोहक था। शहर की महिलाओं ने न केवल विधि-विधान से पूजा की, बल्कि ‘थाली बदलने’ की सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन भी किया। मंदिरों में पंडितों द्वारा सुनाई गई पौराणिक कथाओं ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
पौराणिक कथा और महत्व
पंडित रमेश तिवारी और सुनील शास्त्री ने कथा सुनाते हुए बताया कि कार्तिक मास की चतुर्थी का यह व्रत केवल परंपरा नहीं, बल्कि अटूट प्रेम का प्रतीक है। कथा में वर्णित सात भाइयों की लाडली बहन का प्रसंग महिलाओं की निष्ठा और कठिन व्रत की महिमा को दर्शाता है। इस दौरान उपहारों और मिठास के साथ पति-पत्नी के रिश्ते की डोर और भी मजबूत होती दिखाई दी।
मायने और प्रभाव
बरेली में इस साल का करवाचौथ समाज की एकजुटता का प्रतीक बनकर उभरा है। ऐसे त्योहार न केवल घर-परिवार में खुशहाली लाते हैं, बल्कि भागदौड़ भरी जिंदगी में अपनों के लिए समय निकालने का मौका भी देते हैं। सामूहिक आयोजनों ने यह साबित कर दिया कि आधुनिकता के इस दौर में भी लोग अपनी जड़ों और संस्कारों से मजबूती से जुड़े हुए हैं, जो कि स्थानीय संस्कृति को जीवंत रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है।





