कानपुर में सांस लेना दिन-ब-दिन दूभर होता जा रहा है। शहर के अलग-अलग इलाकों में फैली धूल और मिट्टी ने फिजाओं में जहर घोल दिया है। आलम यह है कि शहर की हवा का स्तर लगातार खराब हो रहा है, जिससे आम जनता को सांस लेने में दिक्कतें पेश आ रही हैं।
निर्माण कार्यों की लापरवाही और बढ़ता प्रदूषण
शहर में जारी विकास कार्यों, विशेषकर सीएम ग्रिड योजना और मेट्रो कॉरिडोर के निर्माण ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। सड़कों की खुदाई के बाद उन्हें अधूरा छोड़ देने के कारण उड़ती धूल सीधे फेफड़ों में जा रही है। हैरानी की बात यह है कि निर्माण स्थलों पर धूल को रोकने के लिए बनाए गए नियमों की जमकर धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। न तो वहां हरे पर्दे लगे हैं और न ही पानी का सही ढंग से छिड़काव किया जा रहा है।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सख्ती
उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपी पीसीबी) की रिपोर्ट के मुताबिक, कानपुर का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) जो अक्टूबर की शुरुआत में 127 था, अब 175 के पार पहुंच चुका है। सामान्य मानक 100 का है, जिसे शहर अब काफी पीछे छोड़ चुका है। इसे देखते हुए यूपी पीसीबी ने नगर निगम और यूपीएमआरसी को कड़ी फटकार लगाते हुए नोटिस जारी किया है।
शहर के प्रमुख प्रभावित इलाके
- स्वरूप नगर सेल्स टैक्स रोड
- ग्रीन पार्क चौराहा से घंटाघर
- किदवई नगर और यशोदा नगर
- कल्याणपुर बगिया क्रॉसिंग रोड
- जूही हमीरपुर रोड
मायने और प्रभाव: आम जनता पर क्या असर?
प्रदूषण की मार: जैसे-जैसे सर्दियां नजदीक आ रही हैं, कोहरे और धुंध के साथ मिलकर यह धूल फेफड़ों के लिए घातक साबित होगी। विशेषज्ञ पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि सांस और दमा के मरीजों के लिए आने वाले दिन चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं।
प्रशासनिक जवाबदेही: नगर निगम के दावे अपनी जगह हैं, लेकिन धरातल पर सफाई और छिड़काव न होना प्रशासन की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। जनता का स्वास्थ्य किसी भी विकास योजना से ऊपर होना चाहिए। यदि समय रहते निर्माण सामग्री को ढंकने और पानी के छिड़काव की व्यवस्था पुख्ता नहीं की गई, तो कानपुर के लोगों को स्वास्थ्य आपातकाल जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
सावधानी जरूरी: फिलहाल, मेडिकल विशेषज्ञों की सलाह है कि बाहर निकलते समय मास्क का उपयोग करें और धूल भरे रास्तों से बचकर चलें।


