न्याय की आस में ठप पड़ी जांच
मुरादाबाद में भाजपा विधायक सुशांत सिंह के रतूपुरा स्थित आवास पर हुई बर्बर पिटाई के मामले ने अब तूल पकड़ लिया है। घटना को बीते 10 दिन बीत चुके हैं, लेकिन पुलिस की फाइलों में अभी तक कोई ठोस कार्रवाई दर्ज नहीं हुई है। न तो अब तक कोई आधिकारिक एफआईआर दर्ज की गई है और न ही उन प्रभावशाली लोगों से कोई पूछताछ हुई है जिनका नाम पीड़ितों ने लिया था।
दिल्ली के अस्पताल में जिंदगी और मौत की जंग
इस बीच, इस घटना में बुरी तरह घायल हुए रामू की हालत एक बार फिर चिंताजनक हो गई है। दिल्ली के मैक्स अस्पताल में भर्ती रामू का शरीर अंदरूनी चोटों के कारण जवाब देने लगा है। परिवार का कहना है कि रामू की स्थिति बिगड़ने से उनके घर में मातम जैसा माहौल है, जबकि दूसरी तरफ सत्ता के गलियारों में चुप्पी छाई हुई है।
प्रशासन की खामोशी पर उठे सवाल
स्थानीय पुलिस की कार्यप्रणाली पर पीड़ित परिवार ने गंभीर सवाल उठाए हैं। परिजनों का आरोप है कि विधायक के नाम के दबाव में जांच को जानबूझकर ठंडे बस्ते में डाला जा रहा है। क्या कानून की नजर में सत्ता पक्ष का रसूख आम आदमी की जान से ज्यादा बड़ा है? यह सवाल मुरादाबाद की आम जनता अब सड़कों पर पूछ रही है।
मायने और प्रभाव: न्याय का सवाल
इस मामले का सीधा असर स्थानीय राजनीति और कानून-व्यवस्था के प्रति भरोसे पर पड़ा है। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- सत्ता का रसूख: जब किसी जनप्रतिनिधि के घर से जुड़ा मामला सामने आता है, तो पुलिस की सक्रियता अक्सर ‘दबाव’ के चलते धीमी पड़ जाती है, जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।
- मानवीय संवेदनाएं: एक युवा का दिल्ली के अस्पताल में दम तोड़ना और दूसरी तरफ पुलिस की बेरुखी पूरे प्रशासनिक तंत्र की असंवेदनशीलता को उजागर करती है।
- कानूनी लड़ाई: यदि समय रहते पुलिस ने कार्रवाई नहीं की, तो पीड़ितों का भरोसा न्यायपालिका से उठ जाएगा, जिससे क्षेत्र में असंतोष बढ़ने की पूरी आशंका है।
आने वाले दिनों में यदि पुलिस ने निष्पक्ष जांच नहीं की, तो यह मामला बड़े विरोध प्रदर्शन का रूप ले सकता है। मुरादाबाद की जनता अब देखना चाहती है कि क्या खाकी वर्दी सत्ता के आगे घुटने टेकती है या कानून अपना काम करता है।




