हिमालय की गोद में मौत का सन्नाटा
नेपाल में हाल ही में आई विनाशकारी बाढ़ ने न केवल जान-माल का भारी नुकसान किया है, बल्कि एक गंभीर कूटनीतिक सवाल भी खड़ा कर दिया है। काठमांडू से लेकर भारत की सीमा तक फैली तबाही के पीछे क्या सिर्फ भारी बारिश है, या फिर तिब्बत की ओर से आने वाले ग्लेशियरों का दबाव? स्थानीय लोग और विशेषज्ञ अब चीन की ओर उंगलियां उठा रहे हैं।
चीन का डेटा क्या छिपा रहा है?
नेपाल और चीन के बीच की सीमा पर आई अचानक बाढ़ ने कई सवाल पैदा किए हैं। नेपाल सरकार अब भारत की तर्ज पर चीन से भी हर 10 मिनट का रियल-टाइम हाइड्रोलॉजिकल डेटा मांग रही है। चौंकाने वाली बात यह है कि पिछले तीन महीनों से बार-बार गुहार लगाने के बावजूद बीजिंग की ओर से कोई ठोस जानकारी साझा नहीं की गई है।
तबाही के पीछे क्या है असली वजह?
- ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट (GLOF): विशेषज्ञों का मानना है कि तिब्बत में ग्लेशियर फटने की घटनाएं हो रही हैं, जिसका पानी सीधे नेपाल की नदियों में कहर बनकर बरस रहा है।
- पारदर्शिता का अभाव: चीन सीमा पार की गतिविधियों पर जानकारी साझा करने से बच रहा है, जिससे बचाव कार्यों में बड़ी मुश्किल आ रही है।
- जलवायु मुआवजा: नेपाल ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इसे ‘जलवायु अन्याय’ करार देते हुए चीन और विकसित देशों से मुआवजे की मांग की है।
मायने और प्रभाव: आम जनता पर असर
यह आपदा केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि आर्थिक और सुरक्षा के लिहाज से भी चिंताजनक है। नेपाल के नदी तंत्र से जुड़े होने के कारण, भविष्य में आने वाली ऐसी बाढ़ का सीधा असर भारत के सीमावर्ती इलाकों जैसे बिहार और उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्रों पर भी पड़ेगा। चीन की यह ‘खामोशी’ हिमालयी सुरक्षा चक्र को कमजोर कर रही है। यदि ऊपरी इलाकों का डेटा समय पर नहीं मिला, तो आने वाले समय में हिमालयी क्षेत्र में ऐसी आपदाएं और भी भयावह हो सकती हैं।




