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यूपी: अदब के शहर में नहीं मिल रहे उर्दू के विद्यार्थी, लखनऊ विश्वविद्यालय में 120 में सिर्फ 45 सीटें भरीं

जिस लखनऊ को पूरी दुनिया ‘अदब और तहजीब’ के शहर के रूप में जानती है, वहीं की गलियों से एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है। कभी गंगा-जमुनी तहजीब की पहचान रही उर्दू भाषा अब लखनऊ विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। हालात इतने गंभीर हैं कि विश्वविद्यालय में उर्दू की 120 सीटों में से अब तक सिर्फ 45 सीटों पर ही दाखिले हो सके हैं।

क्यों खाली रह गईं उर्दू की सीटें?

लखनऊ विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में इस साल नामांकन का आंकड़ा चिंताजनक है। शिक्षाविदों का मानना है कि इसके पीछे कई बड़े कारण हैं। सबसे प्रमुख वजह है करियर की अनिश्चितता। छात्रों का रुझान अब उन विषयों की ओर अधिक है, जहां सीधे तौर पर नौकरी की संभावनाएं दिखती हैं।

बदलती प्राथमिकताएं और शिक्षा का बाजार

तकनीक के इस दौर में भाषा के प्रति छात्रों का नजरिया पूरी तरह से बदल गया है। युवाओं को लगता है कि उर्दू सीखने से इतर अन्य प्रोफेशनल कोर्स उन्हें जल्दी रोजगार दिला सकते हैं। सोशल मीडिया और तकनीक की भाषा ने भी साहित्यिक भाषाओं की जगह अपनी पैठ बना ली है।

  • करियर का अभाव: उर्दू के जानकारों के लिए सरकारी और निजी क्षेत्र में अवसरों की सीमित संख्या।
  • पाठ्यक्रम का पुरानापन: आधुनिक बाजार की जरूरतों के हिसाब से उर्दू पाठ्यक्रम में बदलाव न होना।
  • भाषाई चुनौती: नई पीढ़ी के बीच उर्दू लिपि (खासतौर पर नस्तालीक) को सीखने में आने वाली कठिनाई।

मायने और प्रभाव: क्या यह सिर्फ एक भाषा का पतन है?

यह महज कुछ खाली सीटों का आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक विरासत के दरकने का संकेत है। उर्दू सिर्फ एक भाषा नहीं, बल्कि उस तहजीब का हिस्सा है जिसने लखनऊ को दुनिया भर में एक अलग पहचान दी है। यदि युवा पीढ़ी अपनी जड़ों और उस भाषा से दूर होती गई, तो आने वाले समय में मुंशी प्रेमचंद और फिराक गोरखपुरी की विरासत को समझने वाले लोग भी कम हो जाएंगे। यह भाषा का संकट हमारी उस समावेशी संस्कृति के लिए एक गंभीर चेतावनी है, जिसे लखनऊ ने सदियों तक संजोकर रखा था।

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