मेरठ में किसान नेता दिग्विजय भाटी और मोहित जाटव द्वारा पुलिस पर लगाए गए गंभीर आरोपों ने हड़कंप मचा दिया है। मामला केवल मारपीट तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मानसिक प्रताड़ना और बेहद अपमानजनक व्यवहार के दावे किए गए हैं, जो कानून के रक्षकों की कार्यशैली पर कड़े सवाल खड़े करते हैं।
क्या है पूरा मामला?
दिग्विजय भाटी का दावा है कि हिरासत के दौरान उन्हें बेहद शर्मिंदगी भरी स्थितियों का सामना करना पड़ा। उनका आरोप है कि पुलिस कस्टडी में उन्हें ‘छत पे सोया था बहनोई’ जैसे गानों पर नाचने के लिए मजबूर किया गया। यही नहीं, कथित तौर पर उनसे कहा गया कि ‘सिर पर दुपट्टा तो रखो’, ताकि उनके अपमान को और बढ़ाया जा सके।
पुलिस पर लगे गंभीर आरोप
पीड़ितों ने तत्कालीन एसएसपी अविनाश पांडेय पर मारपीट का सीधा आरोप लगाया है। वहीं, सिविल लाइन थाना प्रभारी अखिलेश गौड़ पर हिरासत में अमानवीय यातनाएं देने का आरोप है। यह पूरा घटनाक्रम मेरठ की कानून व्यवस्था और पुलिसिया दवाब के तरीकों को कठघरे में खड़ा करता है।
जांच के दायरे में आला अधिकारी
इस पूरे मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए, एडीजी ने मामले का संज्ञान लिया है। अब सहारनपुर डीआईजी इस मामले की विस्तृत जांच कर रहे हैं। जांच का केंद्र यह है कि क्या वाकई वर्दी का दुरुपयोग करते हुए किसी को इस तरह मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया?
मायने और प्रभाव: आम जनता के लिए क्यों जरूरी है?
यह मामला केवल एक व्यक्ति के अपमान का नहीं है, बल्कि यह नागरिक अधिकारों का भी मुद्दा है। जब कानून के रक्षक ही कानून के दायरे से बाहर जाकर कस्टडी में इस तरह का बर्ताव करते हैं, तो आम जनता का सिस्टम से भरोसा कम होता है।
- न्यायिक जवाबदेही: पुलिस कस्टडी में मानवाधिकारों का उल्लंघन एक गंभीर अपराध है।
- व्यवस्था पर प्रश्न: उच्च पदस्थ अधिकारियों की भूमिका की जांच से यह स्पष्ट होगा कि क्या मेरठ पुलिस में राजनीतिक या व्यक्तिगत दबाव में कोई विशेष एजेंडा चल रहा था।
- भविष्य की चेतावनी: इस जांच का परिणाम पुलिस सुधार और कस्टडी के नियमों को लेकर एक मिसाल बन सकता है।




