वंदे मातरम पर छिड़ा नया सियासी घमासान
भारत के राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को लेकर एक बार फिर देश की सियासत गरमा गई है। कांग्रेस से लेकर भाजपा तक, हर खेमा इस मुद्दे पर आमने-सामने है। लेकिन इस शोर-शराबे के बीच यह जानना जरूरी है कि इस गीत को लेकर रवींद्रनाथ टैगोर के क्या विचार थे और उन्होंने दशकों पहले कांग्रेस को क्या चेताया था।
क्या था टैगोर का नज़रिया?
इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि रवींद्रनाथ टैगोर वंदे मातरम के प्रति बहुत सम्मान रखते थे, लेकिन उन्होंने इसके पूरे संस्करण को लेकर अपनी चिंताएं भी जाहिर की थीं। 1937 में सुभाष चंद्र बोस को लिखे एक पत्र में टैगोर ने स्पष्ट किया था कि इस गीत के कुछ हिस्सों पर मुस्लिम समुदाय को आपत्ति हो सकती है, जिसे संवेदनशीलता के साथ सुलझाना जरूरी है।
टैगोर का मानना था कि किसी भी राष्ट्रीय गीत में ऐसी भाषा नहीं होनी चाहिए जो किसी खास वर्ग को अलग-थलग महसूस कराए। उन्होंने कांग्रेस से आग्रह किया था कि केवल उन पंक्तियों का ही गान के रूप में प्रयोग हो, जिनसे देश की एकता प्रभावित न हो।
सियासी गलियारों में क्यों है उबाल?
आज के दौर में ‘वंदे मातरम’ का मुद्दा फिर से चुनावी एजेंडे का हिस्सा बन गया है। कहीं इसे देशभक्ति के सर्टिफिकेट के तौर पर देखा जा रहा है, तो कहीं इसे तुष्टिकरण की राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। अलग-अलग पार्टियों के बयान न केवल विवाद बढ़ा रहे हैं, बल्कि जनता के बीच एक भ्रम की स्थिति भी पैदा कर रहे हैं।
मायने और प्रभाव: आम जनता के लिए क्यों जरूरी है यह बहस?
यह मुद्दा सिर्फ एक गीत का नहीं, बल्कि हमारी साझा संस्कृति का है। जब भी इतिहास के संदर्भों को वर्तमान राजनीति के सांचे में ढाला जाता है, तो असल मुद्दा गौण हो जाता है। इसका आम जनता पर सीधा असर यह होता है कि विकास और रोजगार जैसे बुनियादी सवाल पीछे छूट जाते हैं।
- इतिहास का सम्मान: महापुरुषों के विचारों को तोड़-मरोड़कर पेश करने से समाज में वैचारिक मतभेद बढ़ते हैं।
- सियासी उपयोग: वंदे मातरम जैसे संवेदनशील मुद्दों का इस्तेमाल वोट बैंक की राजनीति के लिए करना कहीं न कहीं राष्ट्रवाद की भावना को ही आहत करता है।
- जागरूकता: एक नागरिक के तौर पर हमें यह समझना होगा कि क्या हम अपने राष्ट्रगीत का सम्मान दिल से कर रहे हैं या इसे केवल राजनीतिक बहस का हथियार बना रहे हैं।




