1984 के दंगों का एक अध्याय थमा
1984 के सिख विरोधी दंगों के मुख्य आरोपी और पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार का निधन हो गया है। वह पिछले लंबे समय से बीमारी से जूझ रहे थे और तिहाड़ जेल में अपनी उम्रकैद की सजा काट रहे थे। अस्पताल के सूत्रों ने उनके निधन की पुष्टि की है, जिसके बाद दिल्ली की राजनीति और कानूनी गलियारों में हलचल तेज हो गई है।
आखिरी समय और कानूनी सफर
सज्जन कुमार का नाम 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के दंगों में सबसे प्रमुखता से लिया जाता था। करीब तीन दशकों तक कानूनी दांव-पेच से बचने के बाद, साल 2018 में दिल्ली हाईकोर्ट ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी। उन्हें राजनगर में एक ही परिवार के पांच सदस्यों की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था।
सज्जन कुमार के खिलाफ ठोस सबूत
अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि यह दंगे केवल भीड़ का आक्रोश नहीं थे, बल्कि इन्हें राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से माना था कि सज्जन कुमार ने भीड़ को उकसाने और हिंसा फैलाने में सक्रिय भूमिका निभाई थी। उनके खिलाफ दर्ज कई मामलों में से कुछ अभी भी कानूनी प्रक्रिया के विभिन्न चरणों में थे।
मायने और प्रभाव
सज्जन कुमार का जाना 1984 के पीड़ितों के लिए एक लंबे और थका देने वाले कानूनी संघर्ष का अंत है। आम जनता के लिए यह मामला इस बात का प्रतीक बना रहा कि न्याय में भले ही देरी हो, लेकिन कानून की मार से कोई नहीं बच सकता।
- इंसाफ की लड़ाई: तीन दशक बाद मिली सजा ने देश की न्यायिक प्रणाली में आम लोगों का भरोसा फिर से कायम किया था।
- राजनीतिक सबक: यह मामला उन सभी राजनेताओं के लिए एक नजीर है जो सत्ता के नशे में कानून से ऊपर खुद को समझने की भूल करते हैं।
- पीड़ितों का दर्द: भले ही आज दोषी का निधन हो गया हो, लेकिन दंगों में अपने प्रियजनों को खोने वाले परिवारों के लिए जख्म आज भी गहरे हैं।




