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भारत-पाकिस्तान के बीच जमी बर्फ पिघलेगी? मोदी और शहबाज को 117 दिग्गजों ने लिखी चिट्ठी

भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों से कायम तनाव के बीच अब एक नई पहल की चर्चा जोर-शोर से है। देश के 117 प्रमुख हस्तियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को एक साझा चिट्ठी लिखी है, जिसमें दोनों देशों के बीच संबंधों को सुधारने और बातचीत की मेज पर आने की अपील की गई है।

कौन हैं इस चिट्ठी के पीछे?

इस शांति पहल में राजनीति, कूटनीति और सामाजिक क्षेत्र के दिग्गज शामिल हैं। जम्मू-कश्मीर के कद्दावर नेता फारूक अब्दुल्ला, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर और पूर्व नौकरशाह हुमायूं कबीर समेत 117 प्रमुख नागरिकों ने इस पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं। इन लोगों का मानना है कि दोनों मुल्कों के बीच जारी खटास न केवल कूटनीतिक स्तर पर, बल्कि आम लोगों के स्तर पर भी काफी नुकसान पहुंचा रही है।

क्या है मांग और विवाद?

चिट्ठी में अपील की गई है कि भारत और पाकिस्तान को अपनी पुरानी कड़वाहट को पीछे छोड़ते हुए फिर से संवाद शुरू करना चाहिए। इनका कहना है कि व्यापार, खेल और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बहाल करने से दक्षिण एशिया में स्थिरता आएगी।

हालांकि, इस पत्र के सार्वजनिक होते ही राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई है। भारतीय जनता पार्टी ने इस कदम की तीखी आलोचना की है। भाजपा का रुख साफ है कि ‘आतंक और बातचीत साथ नहीं चल सकते’। पार्टी ने सवाल उठाए हैं कि जब तक सीमा पार से आतंकवाद बंद नहीं होता, तब तक ऐसी बातचीत का कोई औचित्य नहीं है।

मायने और प्रभाव

यह चिट्ठी ऐसे समय में आई है जब दोनों देशों के बीच आधिकारिक स्तर पर बातचीत पूरी तरह बंद है। इसके प्रभाव कुछ इस तरह हो सकते हैं:

  • कूटनीतिक दवाब: यह चिट्ठी अंतरराष्ट्रीय पटल पर शांति का संदेश जरूर देती है, लेकिन भारत सरकार के कड़े रुख के सामने इसका असर सीमित दिखता है।
  • आंतरिक राजनीति: भारत के भीतर विपक्ष और सरकार के बीच एक और नया विवाद छिड़ गया है, जो आगामी चुनाव और राजनीतिक चर्चाओं में जगह बना सकता है।
  • जन-भावना: सरहद के दोनों तरफ के आम लोग, जो वीजा और व्यापारिक पाबंदियों से परेशान हैं, इस खबर को उम्मीद की नजर से देख रहे हैं।

कुल मिलाकर, यह पहल एक बार फिर उस पुराने बहस को जिंदा कर गई है कि ‘क्या पड़ोसियों के साथ शांति के लिए बातचीत ही एकमात्र रास्ता है?’ सरकार फिलहाल अपनी ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति पर कायम है, जिसके चलते इस चिट्ठी का असर जमीन पर दिखने की संभावना फिलहाल कम ही है।

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