अलीगढ़ की मंडियों में इन दिनों मक्का की फसल को लेकर मची होड़ ने किसानों और आढ़तियों, दोनों को हैरान कर दिया है। खेतों से कटी गीली मक्का भी अब सूखने का इंतजार नहीं कर रही, बल्कि हाथों-हाथ बिक रही है। एथनॉल और बियर बनाने वाली बड़ी कंपनियों की भारी मांग के चलते मक्का अब सोने जैसा भाव पा रही है।
गुजरात से लेकर पंजाब तक डिमांड
अलीगढ़ के स्थानीय आढ़ती बताते हैं कि मांग इतनी ज्यादा है कि मक्का के सूखने तक का समय भी नहीं मिल पा रहा है। इस मक्का की सप्लाई सीधे गुजरात के एथनॉल प्लांट, बठिंडा (पंजाब) की बियर यूनिट, मुजफ्फरनगर (यूपी) की डिस्टलरी और जुंडला (हरियाणा) की कंपनियों को की जा रही है।
क्यों बढ़ गई है गीली मक्का की अहमियत?
- इंडस्ट्रियल इस्तेमाल: एथनॉल ब्लेंडिंग और बियर उत्पादन में मक्का का कच्चा माल के रूप में बड़े पैमाने पर उपयोग हो रहा है।
- सीधी खरीद: कंपनियां खुद सीधे मंडियों या आढ़तियों के संपर्क में हैं, जिससे बिचौलियों का खेल कम हुआ है।
- सप्लाई चेन: यूपी, हरियाणा और पंजाब के बीच मक्का की यह ‘सप्लाई चेन’ किसानों के लिए कैश फ्लो का नया जरिया बन गई है।
मायने और प्रभाव: किसानों के लिए क्या है यह बदलाव?
इस पूरी प्रक्रिया के मायने बेहद गहरे हैं। पहले किसान अपनी फसल सुखाकर और साफ करके मंडियों में भटकते थे, लेकिन अब कंपनियों की जरूरतों ने बाजार का रुख बदल दिया है। हालांकि, गीली मक्का बेचने पर किसानों को नमी के कारण भाव में थोड़ा अंतर मिल सकता है, लेकिन तुरंत भुगतान मिलने के कारण वे इसे फायदे का सौदा मान रहे हैं। आने वाले समय में अगर यह मांग बरकरार रही, तो मक्का की खेती का रकबा और भी बढ़ने की उम्मीद है, जो सीधे तौर पर उत्तर प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देगा।





