कन्नौज की गलियों में सन्नाटा पसरा है और एक घर से उठती चीखें पत्थर दिल इंसान को भी झकझोर रही हैं। नीट (NEET) की तैयारी कर रहा एक होनहार युवा सक्षम अब हमारे बीच नहीं रहा। उसने मौत को गले लगा लिया और पीछे छोड़ गया एक सुसाइड नोट, जिसकी चंद पंक्तियां हर मां-बाप के कलेजे को छलनी कर रही हैं।
‘मां, मैं अच्छा बेटा नहीं बन पाया’
सक्षम के कमरे से मिले सुसाइड नोट में लिखी बातें किसी गहरे अवसाद की कहानी बयां करती हैं। उसने लिखा, ‘मां, तुम बहुत अच्छी हो, लेकिन मैं शायद तुम्हारा एक अच्छा बेटा नहीं बन पाया।’ यह आखिरी शब्द उस दबाव को दर्शाते हैं जो आज के दौर में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लाखों युवाओं पर है।
क्या है पूरा मामला?
कन्नौज का रहने वाला सक्षम पूरी शिद्दत के साथ डॉक्टर बनने का सपना देख रहा था। लंबे समय से वह नीट की कोचिंग ले रहा था, लेकिन सफलता न मिल पाने की टीस और भविष्य की चिंता उसे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी। बुधवार की रात जब परिवार सो रहा था, तब उसने अपने कमरे में फांसी लगाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली।
मायने और प्रभाव: समाज के लिए बड़ी सीख
यह घटना केवल एक परिवार का नुकसान नहीं है, बल्कि हमारे पूरे शिक्षा तंत्र और सामाजिक ढांचे पर एक गंभीर सवाल है। नीट जैसे कठिन इम्तिहानों में बढ़ती प्रतिस्पर्धा बच्चों पर मानसिक बोझ बढ़ा रही है।
- अभिभावकों की भूमिका: बच्चों की उम्मीदों का बोझ उनके सपनों पर भारी नहीं पड़ना चाहिए।
- मानसिक स्वास्थ्य: शैक्षणिक सफलता से ज्यादा जरूरी जीवन है, लेकिन समाज इस पर बात करने से आज भी कतराता है।
- खुला संवाद: हमें अपने बच्चों के साथ सिर्फ उनके ‘रिजल्ट’ के बारे में नहीं, बल्कि उनके ‘मन’ के बारे में भी बात करनी होगी।
सक्षम का जाना समाज के लिए एक चेतावनी है। हमें जरूरत है कि हम अपने बच्चों को यह समझाएं कि हार का मतलब जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक नए रास्ते की शुरुआत है।




