कानपुर की गलियों में खौफ का दूसरा नाम
कानपुर के औद्योगिक इलाकों में पिछले कुछ समय से एक अजीबोगरीब दहशत फैली थी। साइकिल पर सवार एक शख्स युवतियों को निशाना बना रहा था, लेकिन वह कोई लूटपाट नहीं करता था। उसका मकसद था—चीखें सुनना और जलती हुई त्वचा का तमाशा देखना। जिसे अब दुनिया ‘केमिकल मैन’ के नाम से जान रही है, उस दिलशाद का पर्दाफाश पुलिस ने कर दिया है।
कैसे बनता था केमिकल का हथियार?
आरोपी दिलशाद एक मामूली लेबर था, जो पत्थरों को जोड़ने वाले घातक केमिकल का इस्तेमाल करता था। वह सुनसान रास्तों पर साइकिल से निकलता और काम पर जाने वाली युवतियों पर यह ज्वलनशील पदार्थ फेंक देता था। यह केमिकल इतनी तेजी से काम करता था कि पीड़ित कुछ समझ पातीं, उससे पहले ही उनका शरीर झुलस जाता था।
हवस और मानसिक विकृति का मेल
पुलिस पूछताछ में जो बातें सामने आई हैं, वे किसी भी सामान्य इंसान को अंदर तक झकझोर देने वाली हैं। दिलशाद ने स्वीकार किया है कि उसे महिलाओं की चीखें सुनने और उनके दर्द को तड़पते हुए देखने में एक अजीब सा ‘मानसिक सुकून’ मिलता था। यह कोई सामान्य अपराध नहीं, बल्कि एक विकृत मानसिकता का परिणाम था जो लंबे समय से समाज के बीच छिपा था।

पुलिस की मशक्कत और गिरफ्तारी
कानपुर कमिश्नरेट पुलिस ने इस केस को चुनौती के तौर पर लिया। सीसीटीवी कैमरों के जाल और स्थानीय लोगों से मिली जानकारी के आधार पर पुलिस ने उस ‘साइकिल वाले’ की घेराबंदी की। आखिरकार, दिलशाद को रंगे हाथों पकड़ने में कामयाबी मिली और अब वह सलाखों के पीछे अपनी करतूतों का हिसाब दे रहा है।
मायने और प्रभाव: समाज के लिए सबक
इस घटना ने कानपुर की कामकाजी महिलाओं की सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। जब कोई अपराधी लूट या चोरी के बजाय केवल ‘पीड़ा पहुँचाने’ के उद्देश्य से सड़कों पर निकलता है, तो वह समाज के हर वर्ग के लिए खतरनाक है।
- सुरक्षा पर जोर: महिलाओं को अब सार्वजनिक स्थानों पर और अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है।
- कानूनी कार्रवाई: पुलिस ने फास्ट-ट्रैक कोर्ट में मामला ले जाने के संकेत दिए हैं ताकि अपराधियों में डर बना रहे।
- मनोवैज्ञानिक पहलू: इस तरह के ‘साइको’ अपराधी हमारे आस-पास ही रहते हैं, जिनका समय रहते चिन्हांकन जरूरी है।


