उत्तर प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों जो चर्चा सबसे ज्यादा गर्म है, वह किसी सरकारी आदेश के बारे में नहीं, बल्कि उन ‘अनकहे’ किस्सों के बारे में है जो चाय की चुस्कियों के साथ हर दफ्तर में गूंज रहे हैं। कहावत है कि दीवारों के भी कान होते हैं, लेकिन लखनऊ के सत्ता के गलियारों में दीवारों को तो छोड़िए, अब हवा भी ‘अंदर की बात’ बयां कर रही है।
चहेतों पर मेहरबानी का दौर
प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में इस समय ‘पसंदीदा’ चेहरों पर कृपा बरसने की खबरें चर्चा के केंद्र में हैं। कुछ चुनिंदा अधिकारियों और नेताओं को दी जा रही अहमियत ने बाकी लोगों के बीच एक खामोश सुगबुगाहट पैदा कर दी है। जो लोग कतार में खड़े थे, उन्हें दरकिनार कर ‘खास लोगों’ को तरजीह देना अब चर्चा का सबसे बड़ा विषय बना हुआ है।
कहीं की खीझ, कहीं का गुस्सा
राजनीति का एक पुराना उसूल है—अगर कहीं काम नहीं बन रहा, तो उसका गुस्सा कहीं और निकाला जाएगा। सत्ता के गलियारों में आजकल यही देखने को मिल रहा है। कहीं और की खीझ किसी और प्रोजेक्ट या छोटे कर्मचारियों पर उतारी जा रही है। यह ‘ट्रांसफर ऑफ फ्रस्ट्रेशन’ न केवल माहौल को तनावपूर्ण बना रहा है, बल्कि कामकाज की रफ्तार पर भी असर डाल रहा है।
राहु-केतु का साया या महज संयोग?
राजनीतिक पंडितों के बीच एक और चर्चा जोर-शोर से है—’राहु-केतु का साया’। सत्ता के समीकरणों में अचानक आए बदलावों को लोग ज्योतिषीय नजरिए से भी देख रहे हैं। वरिष्ठ नेताओं के फैसलों में दिख रही अनिश्चितता और अचानक से मची उठापटक को लोग किसी बड़ी अनहोनी या पुराने ग्रहों के फेर से जोड़कर देख रहे हैं।
मायने और प्रभाव
इस पूरे घटनाक्रम के सीधे मायने यह हैं कि प्रशासनिक तंत्र में एक अजीब सी अनिश्चितता का माहौल है। जब ‘योग्यता’ के बजाय ‘चहेतों’ को तरजीह दी जाती है, तो सिस्टम का मनोबल गिरता है। जनता के लिए इसका सीधा प्रभाव सरकारी योजनाओं की सुस्त रफ्तार के रूप में सामने आता है। जब बड़े अधिकारी या नेता अपनी व्यक्तिगत खीझ को दफ्तर में लाते हैं, तो उसका खामियाजा आम जनता को अपनी फाइलों के चक्कर लगाकर भुगतना पड़ता है।

