क्या आपने कभी बिजली विभाग के चक्कर लगाए हैं? मीटर खराब हो या बिल में गड़बड़ी, अक्सर हमें गोलमोल जवाब ही सुनने को मिलते हैं। लेकिन अब बिजली विभाग ने अपनी कार्यप्रणाली में एक ऐसा बदलाव किया है जो चर्चा का विषय बन गया है। अब अधिकारियों को उपभोक्ताओं के सवालों का जवाब देने के लिए 40 स्टैंडर्ड उत्तर रटाए गए हैं।
40 सवालों की ‘किताब’ से हल होगी परेशानी?
मथुरा में बिजली विभाग ने एक नई पहल शुरू की है। निगम ने अधिकारियों को 40 सामान्य प्रश्नों और उनके उत्तरों वाली एक एफएक्यू (FAQ) बुकलेट थमा दी है। मकसद साफ है—उपभोक्ताओं को हर बार एक जैसा और सटीक जवाब मिले। चाहे मीटर की रीडिंग हो या नया कनेक्शन, अब जवाब इसी किताब के पन्नों से निकलकर आएगा।
उपभोक्ताओं के लिए क्या बदला?
विभागीय तर्क है कि इससे काम में पारदर्शिता आएगी और जवाबदेही बढ़ेगी। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। उपभोक्ताओं का कहना है कि उन्हें लिखित और रटा-रटाया जवाब तो मिल जाता है, लेकिन उनकी ‘असली’ समस्या वहीं की वहीं खड़ी रहती है। कागजी जवाबों से बिल की गड़बड़ी ठीक नहीं हो रही है।
- सीमित दायरे में समाधान: रटे-रटाए जवाबों से जटिल तकनीकी समस्याओं का समाधान मुश्किल है।
- मनोवैज्ञानिक दबाव: अधिकारियों को अपनी समझ के बजाय बुकलेट पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
- निजी अनुभव की अनदेखी: हर उपभोक्ता की समस्या अलग होती है, जिसे एक सांचे में नहीं ढाला जा सकता।
मायने और प्रभाव
इस व्यवस्था के पीछे विभाग की मंशा शायद कार्यकुशलता बढ़ाना है, लेकिन इसके ‘मायने’ काफी गहरे हैं। जब सिस्टम समस्या के निवारण के बजाय केवल ‘जवाब देने’ पर केंद्रित हो जाता है, तो जनता का भरोसा और कम होता है। रटा-रटाया उत्तर सुनने के बाद उपभोक्ता को ऐसा लग सकता है कि उसकी बात सुनी ही नहीं जा रही है।
प्रशासन को यह समझना होगा कि बिजली विभाग कोई ‘कस्टमर केयर कॉल सेंटर’ नहीं है, बल्कि एक जरूरी जनसेवा है। जनता को 40 रटे हुए जवाब नहीं, बल्कि अपनी बिजली से जुड़ी समस्याओं का स्थायी समाधान चाहिए। जब तक अधिकारी अपनी जिम्मेदारी और व्यावहारिक समाधान पर ध्यान नहीं देंगे, ऐसी बुकलेट केवल एक कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाएगी।


